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लघुकथा- मिलन वार्ता

2015 और 2014 के उस एक क्षण के मिलन में 2015 ने 2014 से पूछा, "बड़े भाई, आपका आशीर्वाद दें, साथ ही अपना अनुभव भी बताएँ, मुझे 365 दिनों का श्वास मिला है, ये दिन कैसे काटूँ ताकि जीवन शांत और अर्थपूर्ण रहे|"
2015 ने कहा, "कोशिश करो कि प्रकृति और मानव के बीच एक सेतु बनो ताकि दोनों एक दूसरे से लाभान्वित हों, उन सारे तत्वों को संभाल कर रखो जो कि मानव-जीवन के लिए उपयोगी हैं| मानव की और अधिक चिंता मत करो, उन्हें तुम्हारे 365 दिनों की उम्मीद देने वाले बहुत से हैं| मानव एक दिन लड़ेगा और दूसरे दिन शांति की बात करेगा| उसके लिए प्रकृति की सुरक्षा से अधिक आवश्यक है स्वयं का भोग, उसके लिये ईश्वरीय शांति पाने से ज़रूरी है अपनी भड़ास निकालना और सत्कर्मों से अधिक आवश्यक है- मीठी-मीठी बातें करना| ये सभी के सभी तुम्हारे दिनों का हवाला देकर होंगे|
लेकिन, एक आवश्यक सच सदैव याद रखना कि तुम्हारे अंतिम दिवस पर कोई रोयेगा नहीं, कोई यह नहीं कहेगा कि तुमने365 दिनों तक मानव का साथ दिया, प्रत्येक व्यक्ति 2016 के स्वागत में ही खुशियाँ मनायेगा| यह तो मानव का कर्म है, पर तुम इस छोटी सी बात के लिए अपने धर्म से…

संगीता शर्मा की कविता

संगीता शर्मा ‘अधिकारी’

पोषित पीठ 

क्यों सोचते हो तुम
तुम्हारी पीठ पर
कोई हो

क्या फ़र्क पड़ता है
इस बात से
कि कोई पोषित करे
तुम्हारी पीठ

क्या सिर्फ इसलिए
कि कोई न चढ़ बैठें
तुम्हारी छाती पर

पर क्यों नहीं सोचते तुम
बित्ती भर भी
कि किसी की छाती पर चढ़ना
इतना आसान नहीं

ग़र होता
तो
कर्म गौण
और
बल प्रधान
हो गया होता

कल्पना रामानी के नवगीत

         कल्पना रामानी
धूप सखी 
धूप सखी, सुन विनती मेरी, कुछ दिन जाकर शहर बिताना। पुत्र गया धन वहाँ कमाने, जाकर उसका तन सहलाना।
वहाँ शीत पड़ती है भारी। कोहरा करता चौकीदारी। तुम सूरज की परम प्रिया हो, रख लेगा वो बात तुम्हारी।
दबे पाँव चुपचाप पहुँचकर, उसे प्रेम से गले लगाना।
रात, नींद जब आती होगी साँकल शीत बजाती होगी छिपे हुए दर दीवारों पर, बर्फ हर्फ लिख जाती होगी।
सुबह-सुबह तुम ज़रा झाँककर, पुनः गाँव की याद दिलाना।
मैं दिन गिन-गिन जिया करूँगी। इंतज़ार भी किया करूँगी। अगर शीत ने मुझे सताया, फटी रजाई सिया करूँगी।
लेकिन यदि हो कष्ट उसे तो, सखी! साथ में लेती आना।   ------------------ गुलमोहर की छाँव
गुलमोहर की छाँव, गाँव में काट रही है दिन एकाकी।
ढूँढ रही है उन अपनों को, शहर गए जो उसे भुलाकर। उजियारों को पीठ दिखाई, अँधियारों में साँस बसाकर।
जड़ पिंजड़ों से प्रीत जोड़ ली, खोकर रसमय जीवन-झाँकी।
फल वृक्षों को छोड़ उन्होंने, गमलों में बोन्साई सींचे। अमराई आँगन कर सूने, इमारतों में पर्दे खींचे।
भाग दौड़ आपाधापी में, बिसरा दीं बातें पुरवा की। 
बंद बड़ों की हुई चटाई, खुली हुई है केवल खिड़की। किसको वे आवाज़ लगाएँ, किसे सुनाएँ …

शोध पत्र

उपेन्द्रनाथ अश्क के नाट्य-साहित्य में चित्रित मध्यवर्गीय समाज की समस्याएँ - तरूणा यादव शोधार्थी (हिन्दी) वनस्थली विद्यापीठ (राज.)
साहित्य का विकास समाज सापेक्ष होता है। यह मानव की अत्यन्त रमणीय एवं सशक्त मानसी अनुभूति है। समाज की आधारभूत ईकाई परिवार है तथा परिवार की आधारभूत ईकाई व्यक्ति है। इस प्रकार व्यक्ति से परिवार तथा परिवारों के समूह से समाज बनता है। अतः समाज शब्द का प्रयोग मानव समूह के लिए किया जाता है। परिवार से लेकर विश्वव्यापी मानव समूह तक को समाज की संज्ञा दी जाती है। विभिन्न शब्द कोशों में ‘समाज’ शब्द के अर्थ को स्पष्ट किया है- संस्कृत कोश ग्रन्थ में- ‘‘समाज शब्द की उत्पत्ति ‘सम’ उपसर्ग पूर्वक अज् धातु से धज् प्रत्यय करने से होती है। (सम $ अज् $ धज्) जिसका अर्थ सभा, मण्डल, गोष्ठी, समिति या परिषद।’’ नालन्दा विशाल शब्दसागर के अनुसार - ‘‘समाज का शाब्दिक अर्थ है समूह या गिरोह।’’  साधारणतया उन सभी संगठनों के समूह को समाज कहा जाता है जिन्हें मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपने जीवन को सुखी व पूर्ण बनाने के लिए निर्मित करता है। समाज में होने वाले परिवर्तन का साहित्य पर प्रभाव पड़…

अध्यात्म- आलेख

श्रीप्रकाश
प्रेम, ईश्वर और मनुष्य
मानवता की विकास यात्रा आदि से वर्तमान तक जिस रूप में प्रारंभ हुई थी उसका स्वरुप विभिन्न कालखण्डों में घटता-बढ़ता देखा जाता रहा है| अतीत का भाव प्रधान मनुष्य वर्तमान में बुद्धिप्रधान बन बैठा है| यही कारण है कि आज मनुष्य मानव कम, दानव अधिक है| महाकवि प्रसाद ने ठीक ही कहा है- “उनको कैसे समझा दूँ तेरे रहस्य की बातें, जो खुद को समझ चुकें हैं अपने विलास की घातें|” अर्थात प्रेम का रहस्य साधारण मनुष्य से परे है, इसमें मुझे किंचित मात्र भी संदेह नहीं लगता| यदि प्रश्न करें कि क्या मानव प्रेम स्वरूप ईश्वर बन सकता है? तो हमें उत्तर मिलता है की मनुष्य प्रेम का स्वरुप अपनाता कहाँ है? प्रेम के भाव प्रधान होने के कारण उसमें न तो श्रद्धा की कमी होती है और न तो विश्वास का अभाव| प्रेम अँधा होता है| जिसे दिखाई नहीं देता उसे अपने पात्र में सब कुछ सकारात्मक ही दृष्टिगोचर होता है| अब आप ही देखिए कि भगवान् राम को अतिशय प्रेमवश शबरी ने जूठे बेर ही खिला डाले और ईश्वरावतार प्रभु राम ने उसे सहर्ष खा भी लिया|प्रेम जोड़ता है अलगाव नहीं उत्पन्न करता, इसीलिए विवेकानंद ने प्रेम को ईश्वरीय …

प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा का आलेख

आखिर कब तक - प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा थूकना एक आम प्रवृति है. प्रकृति के अनुसार प्रायः विजातीय द्रव्य को बाहर निकालना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. प्रत्येक प्राणी के मुँह में लार बनती है जो पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने का एक प्रमुख कारक है. खाना खाने में इसीलिए कम से कम ३२ बार चबाकर खाने को कहा जाता है कि एक तो जो पदार्थ हम खा रहे हैं वह अच्छी तरह चबाने से सूक्ष्म होगा, साथ ही मुँह की लार ग्रंथि से निकलने वाला द्रव (लार) अच्छी तरह से खाने वाले पदार्थ के साथ मिलकर भोज्य पदार्थ को आसानी से पचा देगा. प्रायः कुछ परिस्थतियों यथा व्रत/ रोजा जिनमें पानी का ग्रहण वर्जित होता है, को छोड़कर थूकना सामान्यतया विपरीत प्रक्रिया की श्रेणी में आता है. पशुओं को मैंने तो थूकते नहीं देखा, हाँ लार टपकाते अवश्य देखा है. पहले आदमी आगे-पीछे देखकर थूकता था कि किसी के ऊपर पड़ न जाए. यदि अनजाने में किसी के ऊपर थूक पड़ जाए तो अति विनम्रता के साथ कई बार खेद प्रकट करते हुए क्षमा माँगता था, परन्तु आज की परिस्थतियाँ भिन्न हैं. ‘पान खाए सैयाँ हमार, मलमल के कुरते पर छींट लाल लाल’ का मधुर गीत और ”कु”व्याख्या आनंद देती है …

हमारे रचनाकार- करीम पठान 'अनमोल'

करीम पठान अनमोल
जन्मतिथि- 19 सितंबर 1989 जन्मस्थान- सांचोर (जालोर) शिक्षा- एम. ए. (हिन्दी) लेखन विधाएँ- ग़ज़ल, गीत, कविता, दोहा, कहानी आदि विधाओं में लेखन सम्प्रति- वेब पत्रिका 'साहित्य रागिनी' में प्रधान संपादक प्रकाशन- ग़ज़ल संग्रह 'इक उम्र मुकम्मल' प्रकाशित (2013)         विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ निरंतर प्रकाशित पता- बहलिमों का वास, सांचोर      (जालोर) राज. 343041 मो.- 09829813958 ई-मेल k.k.pathan.anmol@gmail.com
करीम पठान अनमोल की कविताएँ 
हाँ...मैं कवि हूँ
हाँ...मैं कवि हूँ वेदना, विडंबना और विरह की धुंधली-सी एक छवि हूँ हाँ...मैं कवि हूँ जेठ दुपहरी में नभ के माथे पर अपने ही संताप में तपता हुआ संतप्त रवि हूँ हाँ...मैं कवि हूँ जीवन-यज्ञ में अभीष्ट की कामना लिए अंग-अंग आहुत होता स्वयं हवि हूँ हाँ...मैं कवि हूँ
तीन क्षणिकाएँ तुम्हारे लिए
(1) सुनो! तुम्हारी कविता के शब्द मेरी कलम का हाथ थामकर बहुत दूर निकल जाना चाहते हैं किसी ऐसी जगह जहाँ वे अपने दिल की बात कह सकें मुझसे बेझिझक बिना रोक-टोक के
(2) तुम्हें पता है? तुम्हारी कविताओं के प्रतीक बाक़ायदा जीवित हो उठते हैं कभी-कभी जैसे 'चाँद' और मुझमें कोई फ़र्क नहीं …