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सुनो चारुशीला – एक पाठकीय प्रतिक्रिया

संध्या सिंह 
           नरेश सक्सेना के बारे कुछ लिखने की कोशिश इस प्रकार है जैसे नन्हे पौधे बरगद के बारे में कुछ कहना चाहें या फिर नदियों से समंदर के बारे में पूछा जाए. वे ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने बहुत कम कविताओं में भी बहुत अधिक पाठक बटोरे. नरेश सक्सेना एक ऐसी शख्सियत हैं जो अपना आजीविका धर्म निबाहते हुए जीवन भर बंजर ज़मीन पर खड़े रहे और सीमेंट व कंक्रीट के ठोस धरातल पर खड़े-खड़े जाने कितनी कविताएँ लहलहा दीं अपनी नर्म मुलायम मन की मिट्टी पर. सिविल इंजीनीयरिंग जैसी शुष्क नौकरी इतने लम्बे समय तक करने के बाद भी इन्होंने कविता की नमी बचा कर रखी. यह उनकी एक ऐसी विशेषता है जो उन्हें अन्य कवियों से अलग करती है.            नरेश सक्सेना की कविता में जो रवानगी है, जो प्रवाह है, जो बहाव है वो मात्र सपाट गति नहीं वरन एक लय है जो पाठक की धड़कन की धक्-धक् के साथ ताल बिठा कर रफ़्तार पकडती है और उठती-गिरती साँसों के साथ फेफड़ों में समा जाती है, अंततः समूची कविता प्राणवायु बन कर लहू में बहने लगती है. उनकी कविताओं में पाठक के साथ एकरूप हो जाने की अद्भुत क्षमता है.            उनकी काव्यभूमि इतनी उर्वर है कि…