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यादों से- संजय मिश्र ‘हबीब’

स्व. संजय मिश्र 'हबीब'
कह मुकरी गोदी में सिर रख सो जाऊँ
कभी रात भर संग बतियाऊँ रस्ता मेरा देखे दिन भर क्या सखि साजन? ना सखि बिस्तर - - - - -

ग़ज़ल
फिर मिलेंगे अगर खुदा लाया

क्या पता अच्छा या बुरा लाया। चैन दे, तिश्नगी उठा लाया।
जो कहो धोखा तो यही कह लो, अश्क अजानिब के मैं चुरा लाया।
क्यूँ फिजायें धुआँ-धुआँ सी हैं, याँ शरर कौन है छुपा लाया।
बाग में या के हों बियाबाँ में, गुल हों महफूज ये दुआ लाया।
लूटा वादा उजालों का करके, ये बता रोशनी कुजा लाया?
मेरा साया मुझी से कहता है, अक्स ये कैसा बदनुमा लाया।  
लो सलाम आखिरी कजा लायी, फिर मिलेंगे अगर खुदा लाया।
             हो मेहरबाँ 'हबीब' उसुर मुझपे,                        इम्तहाँ रोज ही जुदा लाया। - - - - - 
लघुकथाएँ चाबी
राजकुमार तोते को दबोच लाया और सबके सामने उसकी गर्दन मरोड़ दी. “तोते के साथ राक्षस भी मर गया” इस विश्वास के साथ प्रजा जय-जयकार करती हुई सहर्ष अपने-अपने कामों में लग गई।

उधर दरबार में ठहाकों का दौर तारीं था. हंसी के बीच एक कद्दावर, आत्मविश्वास भरी गंभीर आवाज़ गूँजी. “युवराज! लोगों को पता ही नहीं चल पाया कि हमने अपनी ‘जान’ तोते में से निकालक…