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गोरख पाण्डेय की कविताएँ

तमाम विद्रूपताओं और अंधे संघर्षों के बावजूद जीवन में उम्मीद और प्यार के पल बिखरे मिलते हैं. इन्हीं पलों को बुनने वाले कवि का नाम है गोरख पाण्डेय. इनकी कविताओं में जीवन और समाज की सच्चाईयाँ अपनी पूरी कुरूपता के साथ मौजूद हैं लेकिन इनके बीच जीवन का सौन्दर्य आशा की किरण बनकर निखर आता है. 

प्रस्तुत हैं सौन्दर्य और संघर्ष के कवि गोरख पाण्डेय की कुछ कविताएँ-
सात सुरों में पुकारता है प्यार  (रामजी राय से एक लोकगीत सुनकर)
माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी
जोगी शिरीष तले मुझे मिला
सिर्फ एक बाँसुरी थी उसके हाथ में आँखों में आकाश का सपना पैरों में धूल और घाव
गाँव-गाँव वन-वन भटकता है जोगी जैसे ढूँढ रहा हो खोया हुआ प्यार भूली-बिसरी सुधियों और नामों को बाँसुरी पर टेरता
जोगी देखते ही भा गया मुझे माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी
नहीं उसका कोई ठौर ठिकाना नहीं ज़ात-पाँत दर्द का एक राग गाँवों और जंगलों को गुंजाता भटकता है जोगी कौन-सा दर्द है उसे माँ क्या धरती पर उसे कभी प्यार नहीं मिला? माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी
ससुराल वाले आएँगे लिए डोली-कहार बाजा-गाजा बेशक़ीमती कपड़ों में भरे दूल्हा राजा हाथी-घोड़ा शान-शौकत तुम संकोच मत करना, माँ अगर वे गुस…
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कहानी - जली हुई रस्सी

-शानी
अपने बर्फ जैसे हाथों से वाहिद ने गर्दन से उलझा हुआ मफलर निकाला और साफिया की ओर फेंक दिया। पलक-भर वाहिद की ओर देखकर साफिया ने मफलर उठाया और उसे तह करती हुई धीमे स्वर में बोली, 'क्या मीलाद में गए थे?' वाहिद ने बड़े ठंडे ढंग से स्वीकृतिसूचक सिर हिलाया और पास की खूँटी में कोट टाँग खिड़की के पास आया। खिड़की के बाहर अँधेरा था, केवल सन्नाटे की ठंडी साँय-साँय थी, जिसे लपेटे बर्फीली हवा बह रही थी। किंचित सिहरकर वाहिद ने खिड़की पर पल्ले लगा दिए और अपने बज उठते दाँतों को एक-दूसरे पर जमाते हुए बोला 'कितनी सर्दी है! जिस्म बर्फ हुआ जा रहा है, चूल्हे में आग है क्या?' प्रश्न पर साफिया ने आश्चर्य से वाहिद की ओर देखा। बोली नहीं। चुपचाप खाट पर लेटे वाहिद के पास आई, बैठी और उसके कंधे पर हाथ रखकर स्नेह-सिक्त स्वर में बोली, 'मेरा बिस्तर गर्म है, वहाँ सो जाओ।' वाहिद अपनी जगह लेटा रहा, कुछ बोला नहीं। थोड़ी देर के बाद उठकर पास ही पड़ी पोटली खींची, उसकी गाँठें खोली और कागज की पुड़िया रूमाल से अलग कर बोला, 'शीरनी है, लो खाओ।' 'रहने दो,' साफिया बोली 'सुबह खा लूँगी। क्…

सआदत हसन मंटो की लघुकथाएँ

सआदत हसन मंटो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ कहानीकारों में से एक थे. मंटो ने कोई उपन्यास नहीं लिखा, केवल अपनी कहानियों के दम पर साहित्य में अपनी जगह बना ली. जहाँ एक और उनकी कहानियों में विभाजन, दंगों और सांप्रदायिकता पर तीखे कटाक्ष देखने को मिलते हैं वहीँ दूसरी ओर मानवीय संवेदना के सूत्र भी कथानक में बिखरे होते हैं.  प्रस्तुत है उनकी पाँच लघु कहानियाँ -
घाटे का सौदा दो दोस्तों ने मिलकर दस-बीस लड़कियों में से एक लड़की चुनी और बयालीस रुपए देकर उसे खरीद लिया। रात गुजारकर एक दोस्त ने उस लड़की से पूछा-“तुम्हारा नाम क्या है?” लड़की ने अपना नाम बताया तो वह भिन्ना गया-"हमसे तो कहा गया था कि तुम दूसरे मजहब की हो…" लड़की ने जवाब दिया-"उसने झूठ बोला था।" यह सुनकर वह दौड़ा-दौड़ा अपने दोस्त के पास गया और कहने लगा-"उस हरामजादे ने हमारे साथ धोखा किया है…हमारे ही मजहब की लड़की थमा दी…चलो, वापस कर आएँ…।"
करामात लूटा हुआ माल बरामद करने के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरू किए। लोग डर के मारे लूटा हुआ माल रात के अँधेरे में बाहर फेंकने लगे; कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपना माल भी मौका पाकर अपने से अलह…