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प्रदीप कुशवाहा की कविता

मेरे पन्ने -----------

- प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा

जीवन पृष्ठ मेरे
हाथों में तेरे
खुली किताब की तरह
कुछ चिपके पन्ने कह रहे
दास्तान पढ़ने को
है अभी बाक़ी
लौट आया हूँ फिर
चाहता हूँ
रुकूँ अभी
हवा के तेज झोंके
जीवन पृष्ठों को
तेजी से बदलते हुए
चिपका हूँ
दीवार के साथ
बूझेगा अब कौन
न है मधुशाला
न उसमे साकी

प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा का आलेख

आखिर कब तक - प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा थूकना एक आम प्रवृति है. प्रकृति के अनुसार प्रायः विजातीय द्रव्य को बाहर निकालना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. प्रत्येक प्राणी के मुँह में लार बनती है जो पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने का एक प्रमुख कारक है. खाना खाने में इसीलिए कम से कम ३२ बार चबाकर खाने को कहा जाता है कि एक तो जो पदार्थ हम खा रहे हैं वह अच्छी तरह चबाने से सूक्ष्म होगा, साथ ही मुँह की लार ग्रंथि से निकलने वाला द्रव (लार) अच्छी तरह से खाने वाले पदार्थ के साथ मिलकर भोज्य पदार्थ को आसानी से पचा देगा. प्रायः कुछ परिस्थतियों यथा व्रत/ रोजा जिनमें पानी का ग्रहण वर्जित होता है, को छोड़कर थूकना सामान्यतया विपरीत प्रक्रिया की श्रेणी में आता है. पशुओं को मैंने तो थूकते नहीं देखा, हाँ लार टपकाते अवश्य देखा है. पहले आदमी आगे-पीछे देखकर थूकता था कि किसी के ऊपर पड़ न जाए. यदि अनजाने में किसी के ऊपर थूक पड़ जाए तो अति विनम्रता के साथ कई बार खेद प्रकट करते हुए क्षमा माँगता था, परन्तु आज की परिस्थतियाँ भिन्न हैं. ‘पान खाए सैयाँ हमार, मलमल के कुरते पर छींट लाल लाल’ का मधुर गीत और ”कु”व्याख्या आनंद देती है …

प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा की दो लघुकथाएँ

प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा 
बाल श्रम कई प्रतिष्ठित समाजसेवी संगठनों में उच्च पदधारिका तथा सुविख्यात समाज सेविका निवेदिता आज भी बाल श्रम पर कई जगह ज़ोरदार भाषण देकर घर लौटीं. कई-कई कार्यक्रमों में भाग लेने के उपरान्त वह काफी थक चुकी थीं. पर्स और फाइल को मेज पर फेंकते हुए निढाल सोफे पर पसर गईं. झबरे बालों वाला प्यारा सा पप्पी तपाक से उनकी गोद में कूद गया.
"रमिया! पहले एक ग्लास पानी ला... फिर एक कप गर्म-गर्म चाय......"
दस-बारह बरस की रमिया भागती हुई पानी लिए सामने चुपचाप खड़ी हो जाती है.
"ये बता री, आज पप्पी को टहलाया था?"

"माफ़ कर दो मेम साब, सारा दिन बर्तन माँजने, घर की सफाई और कपडे धोने में निकल गया इसलिए आज पप्पी को टहला नहीं पाई...." - - - - - 
आइना
“नीलम, जब से तुम इस घर में ब्याह के आई तभी से घर-बाहर, टॉयलेट आदि की साफ-सफाई करती रही हो. अब ये सब कैसे होगा डॉक्टर ने तुम्हें शारीरिक श्रम हेतु मना किया है। क्यों न इस कार्य हेतु किसी को रख लिया जाए.” नीलम ने सकुचाते हुए कहा, “मुझे कोई आपत्ति नहीं पर आप तो महात्मा गाँधी के सच्चे अनुयायी हैं।“

लघु कथा- रक्षा बंधन

अलीशा माँ की उँगली पकड़े लगभग घिसटती-सी चली जा रही थी। उसकी नजरें सड़क के दोनों ओर दुल्हन-सी सजी मिठाई और राखी की दुकानों पर टिकी थीं। दोनों जब पुष्पा दीदी के घर पहुँचे तो वहाँ भी रक्षा बंधन के पर्व पर जश्न का माहौल था। पुष्पा दीदी की पौत्री अंशिका जब अपने भाई अंशु की कलाई में रक्षा सूत्र बाँध रही थी तब कोने में शांत बैठी अलीशा के दिल में उठ रहे भावों को अंशु ने पढ़ लिया। अंशिका जब रक्षा सूत्र बाँध चुकी तो अंशु ने थाली में से एक रक्षा सूत्र उठाया और अलीशा को थमाते हुए अपनी कलाई उसकी ओर बढ़ा दी। अलीशा सकपकाते हुए बोली, “मैं मुसलमान....” 
अंशु बोला, “तुम और कोई नहीं सिर्फ और सिर्फ मेरी बहन हो!” - प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा