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सामाजिक दायित्व निर्वहन में समकालीन कविता की भूमिका

- डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव 
        समाजिक दायित्व के निर्वहन में समकालीन कविता की भूमिका पर विचार करने के पूर्व यह समझना आवश्यक प्रतीत होता है कि समकालीन कविता क्या है और सामाजिक दायत्वि क्या है। समकालीन कविता की कोई सार्वभौम परिभाषा नहीं है। अनेक विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से उसे परिभाषित करने का प्रयास किया है। किसी के अनुसार समकालीन कविता वह है जो पाठकों को यह बोध कराने में समर्थ हो कि वे किस माहौल में जी रहे हैं। डॉ यतीन्द्र तिवारी के शब्दों में समकालीन कविता समसामयिक समाज से उपजी आशाओं का बिम्ब है। वह एक अतिरिक्त यथार्थ और जीवन है जिसमें शाश्वत जीवन मूल्यों की मिठास और यथार्थ की कड़वाहट अर्थात दोनों की समरसता विद्यमान है इसीलिए इसमें काव्य का रसानन्द और जीवन सत्य की विभीषिकाओं से संघर्ष प्रेरणा दोनों मिलती हैं। कुछ के विचार से समकालीन कविता आदमी को आदमी बनाए रखने का संवेदनात्मक संवाद है और यह परम्परागत काव्यशास्त्रीय दायरों में बॅधकर लिखी जाने वाली कविता नहीं है। कुछ विचारक इसे काल-खण्ड से जोड़ते है अर्थात विगत 30-40वर्षों से जिस प्रकार की कविताएँ रची गई हैं और …