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संगीता शर्मा की कविता

संगीता शर्मा ‘अधिकारी’

पोषित पीठ 

क्यों सोचते हो तुम
तुम्हारी पीठ पर
कोई हो

क्या फ़र्क पड़ता है
इस बात से
कि कोई पोषित करे
तुम्हारी पीठ

क्या सिर्फ इसलिए
कि कोई न चढ़ बैठें
तुम्हारी छाती पर

पर क्यों नहीं सोचते तुम
बित्ती भर भी
कि किसी की छाती पर चढ़ना
इतना आसान नहीं

ग़र होता
तो
कर्म गौण
और
बल प्रधान
हो गया होता