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प्रवासी हिन्दी साहित्य में जड़ें, परंपरा एवं देशभक्ति

मनोज कुमार श्रीवास्तव
     क्या प्रवासी हिन्दी साहित्य पछतावे का साहित्य होकर ही जड़ों का या देशप्रेम का साहित्य हो सकता है? कि जिसके चरित्र पीछे मुड़कर देखने की प्रक्रिया में ही मुब्तिला हैं? कि उस साहित्य में बार-बार ऐसे चरित्र आते हैं जो अलग अलग परिस्थितियों से पहुँचते एक ही जगह हैं जहाँ वे अपने अभी तक जिए हुए की रिव्यू कर रहे होते हैं? अपने जीवन के अभी तक चले आए संस्करण की किसी न किसी बहाने से समीक्षा। इस समीक्षा में कहीं साहस होता है तो कहीं संकोच। लेकिन अधिकतर यह बहुत घटना-बहुल साहित्य नहीं है, यह मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रियाओं का साहित्य है। कहीं पाले हुए भरम टूटते हैं तो कहीं कुछ नए भरम बनते हैं। कहीं निराशा है तो कहीं घिन। भीतर ही भीतर इन कहानियों और कविताओं में एक प्रतिरोध सा पकता रहता है। प्रवासी होना एक लगातार कायांतरण में, एक perpetual metamorphosis में रहना है। खासकर तब जब साहित्यकार होने के नाते आपके संवेदन-तंतु कुछ ज्यादा ही जागृत हों। यह देखकर आश्चर्य होता है कि जिन लोगों को हिन्दुस्तान का आम आदमी स्थापित (Well settled) मानता है, उनका साहित्य स्वयं में स्थैर्य (stability) …