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नरेश शांडिल्य के दोहे

नरेश शांडिल्य
दोहे
एक कहो कैसे हुई, मेरी-उसकी बात। मैंने सब अर्जित किया, उसे मिली खैरात।।
भीख न दी मैंने उसे, लौट गया वो दीन। उससे भी बढ़कर हुई, खुद मेरी तौहीन।।
उनकी आँखों में पढ़ी, विस्थापन की पीर। उपन्यास से कम न था, उन आंखों का नीर।।
ख्वाब न हों तो जिन्दगी, चलती-फिरती लाश। पंख लगाकर ये हमें, देते हैं आकाश।।
महलों पर बारिश हुई, चहके सुर-लय-साज। छप्पर मगर गरीब का, झेले रह-रह गाज।।
कहना है तो कह मगर, कला कहन की जान। एक महाभारत रचे, फिसली हुई जुबान।।
कबिरा की किस्मत भली, कविता की तकदीर। कबिरा कवितामय हुआ, कविता हुई कबीर।।
मुट्ठी में दुनिया मगर, ढूँढ रहा मैं नींद। खोई जिसकी बींदणी, मैं हूँ ऐसा बींद।।
‘सिंह गया तब गढ़ मिला’, हा ये कैसी जीत। तुम्हीं कहो इस जीत का, कैसे गाऊँ गीत।।
इस दुनिया से आपकी, नहीं पड़ेगी पूर। चलो चलें शांडिल्य जी, इस दुनिया से दूर।। http://shabdvyanjana.com/AuthorPost.aspx?id=1015&rid=11

आभासी दुनिया और साहित्य

- डा0 हेमन्त कुमार साहित्य हमेशा तमाम तरह के खतरों और विरोधाभासों के बीच लिखा जाता रहा है,और लिखा जाता रहेगा। लेकिन साहित्य तो अन्ततः साहित्य ही कहा जायेगा,उसे अभिव्यक्त करने का माध्यम भले ही बदलता जाय।इधर काफ़ी समय से साहित्य जगत में इस बात से खलबली भी मची है और लोग चिन्तित भी हैं कि अन्तर्जाल का फ़ैलाव साहित्य को नुकसान पहुँचाएगा। लोगों का चिन्तित होना स्वाभाविक है। लेकिन क्या किसी नये माध्यम के चैलेंज का साहित्य का यह पहला सामना है? इसके पहले भी तो जब टेलीविजन पर सीरियलों का आगमन हुआ था, नये चैनलों की भरमार हुयी थी—क्या तब भी साहित्य के सामने यही प्रश्न नहीं उठे थे? तो क्या चैनलों के आने से साहित्य के लेखन या पठनीयता में कमी आ गयी थी? अगर आप पिछले दिनों को याद करें तो—‘चन्द्रकान्ता’ धारावाहिक के प्रसारण के बाद ‘चन्द्रकान्ता सन्तति’ उपन्यास तमाम ऐसे लोगों ने पढ़ा जिनसे कभी भी साहित्य का नाता नहीं रहा था। भीष्म साहनी का उपन्यास “तमस”, मनोहर श्याम जोशी का “कुरु कुरु स्वाहा”, “तमस” और “कक्का जी कहिन” धारावाहिकों के प्रसारण के बाद तमाम पाठकों ने उत्सुकतावश पढ़ा। तो टेलीविजन ने साहित्य के पाठ…

कबीर के दोहे

पर नारी पैनी छुरी, विरला बांचै कोय कबहुं छेड़ि न देखिये, हंसि हंसि खावे रोय।
पर नारी का राचना, ज्यूं लहसून की खान। कोने बैठे खाइये, परगट होय निदान।।
कुटिल वचन सबतें बुरा, जारि करै सब छार। साधु वचन जल रूप है, बरसै अमृत धार।।
शब्द न करैं मुलाहिजा, शब्द फिरै चहुं धार। आपा पर जब चींहिया, तब गुरु सिष व्यवहार।।
कागा काको धन हरै कोयल काको देत मीठा शब्द सुनाय के, जग अपनी करि लेत
शब्द बराबर धन नहीं, जो कोय जानै बोल हीरा तो दामों मिलै, सब्दहिं मोल न तोल

हर पल यहाँ.....

संगीता सिंह ''भावना''

टूटते सपनों को देखा सिसकते अरमानों को देखा दूर जाती हुई खुशियों को देखा भीगी पलकों से ....... बिखरते अरमानों को देखा , अपनों का परायापन देखा . परायों का अपनापन देखा रिश्तों की दुनिया देखी थमती सांसों ने ..... धीरे से फिर जिन्दगी को हँसते देखा .. भावनाओं की व्याकुलता देखा आँखों में तड़प देखा नफरतों की आँधियों को देखा रिश्तों के बंधन में ..... कितने ही अजीब और असहज पल देखा बुलंदियों का शिखर देखा सपनों की उड़ान देखा हर एहसासों की कड़वी सच्चाई देखा हर पल यहाँ ..||

सुनो चारुशीला – एक पाठकीय प्रतिक्रिया

संध्या सिंह 
           नरेश सक्सेना के बारे कुछ लिखने की कोशिश इस प्रकार है जैसे नन्हे पौधे बरगद के बारे में कुछ कहना चाहें या फिर नदियों से समंदर के बारे में पूछा जाए. वे ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने बहुत कम कविताओं में भी बहुत अधिक पाठक बटोरे. नरेश सक्सेना एक ऐसी शख्सियत हैं जो अपना आजीविका धर्म निबाहते हुए जीवन भर बंजर ज़मीन पर खड़े रहे और सीमेंट व कंक्रीट के ठोस धरातल पर खड़े-खड़े जाने कितनी कविताएँ लहलहा दीं अपनी नर्म मुलायम मन की मिट्टी पर. सिविल इंजीनीयरिंग जैसी शुष्क नौकरी इतने लम्बे समय तक करने के बाद भी इन्होंने कविता की नमी बचा कर रखी. यह उनकी एक ऐसी विशेषता है जो उन्हें अन्य कवियों से अलग करती है.            नरेश सक्सेना की कविता में जो रवानगी है, जो प्रवाह है, जो बहाव है वो मात्र सपाट गति नहीं वरन एक लय है जो पाठक की धड़कन की धक्-धक् के साथ ताल बिठा कर रफ़्तार पकडती है और उठती-गिरती साँसों के साथ फेफड़ों में समा जाती है, अंततः समूची कविता प्राणवायु बन कर लहू में बहने लगती है. उनकी कविताओं में पाठक के साथ एकरूप हो जाने की अद्भुत क्षमता है.            उनकी काव्यभूमि इतनी उर्वर है कि…

प्रवासी हिन्दी साहित्य में जड़ें, परंपरा एवं देशभक्ति

मनोज कुमार श्रीवास्तव
     क्या प्रवासी हिन्दी साहित्य पछतावे का साहित्य होकर ही जड़ों का या देशप्रेम का साहित्य हो सकता है? कि जिसके चरित्र पीछे मुड़कर देखने की प्रक्रिया में ही मुब्तिला हैं? कि उस साहित्य में बार-बार ऐसे चरित्र आते हैं जो अलग अलग परिस्थितियों से पहुँचते एक ही जगह हैं जहाँ वे अपने अभी तक जिए हुए की रिव्यू कर रहे होते हैं? अपने जीवन के अभी तक चले आए संस्करण की किसी न किसी बहाने से समीक्षा। इस समीक्षा में कहीं साहस होता है तो कहीं संकोच। लेकिन अधिकतर यह बहुत घटना-बहुल साहित्य नहीं है, यह मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रियाओं का साहित्य है। कहीं पाले हुए भरम टूटते हैं तो कहीं कुछ नए भरम बनते हैं। कहीं निराशा है तो कहीं घिन। भीतर ही भीतर इन कहानियों और कविताओं में एक प्रतिरोध सा पकता रहता है। प्रवासी होना एक लगातार कायांतरण में, एक perpetual metamorphosis में रहना है। खासकर तब जब साहित्यकार होने के नाते आपके संवेदन-तंतु कुछ ज्यादा ही जागृत हों। यह देखकर आश्चर्य होता है कि जिन लोगों को हिन्दुस्तान का आम आदमी स्थापित (Well settled) मानता है, उनका साहित्य स्वयं में स्थैर्य (stability) …