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जाँ निसार अख़्तर

जाँ निसार अख़्तर
जन्म:-14 फ़रवरी 1914 निधन:-19 अगस्त 1976 जन्म स्थान:- ग्वालियर, मध्य प्रदेश, भारत कुछ प्रमुखकृतियाँ:-  नज़रे-बुताँ, सलासिल, जाँविदां, घर आँगन, ख़ाके-दिल, तनहा सफ़र की रात, जाँ निसार अख़्तर-एक जवान मौत
आवाज़ दो हम एक हैं

एक है अपना जहाँ, एक है अपना वतन अपने सभी सुख एक हैं, अपने सभी ग़म एक हैं आवाज़ दो हम एक हैं.
ये वक़्त खोने का नहीं, ये वक़्त सोने का नहीं जागो वतन खतरे में है, सारा चमन खतरे में है फूलों के चेहरे ज़र्द हैं, ज़ुल्फ़ें फ़ज़ा की गर्द हैं उमड़ा हुआ तूफ़ान है, नरगे में हिन्दोस्तान है दुश्मन से नफ़रत फ़र्ज़ है, घर की हिफ़ाज़त फ़र्ज़ है बेदार हो,

जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद जन्म: 30 जनवरी 1889 निधन: 14 जनवरी 1937 जन्म स्थान:  वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत
कुछ प्रमुख कृतियाँ:  कामायनी, आँसू, कानन-कुसुम, प्रेम पथिक, झरना, लहर

अरुण यह मधुमय देश
अरुण यह मधुमय देश हमारा। जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा। सरस तामरस गर्भ विभा पर नाच रही तरुशिखा मनोहर। छिटका जीवन हरियाली पर मंगल कुंकुम सारा।।
लघु सुरधनु से पंख पसारे शीतल मलय समीर सहारे। उड़ते खग जिस ओर मुँह किए समझ नीड़ निज प्यारा।।
बरसाती आँखों के बादल बनते जहाँ भरे करुणा जल। लहरें टकरातीं अनंत की पाकर जहाँ किनारा।।
हेम कुंभ ले उषा सवेरे भरती ढुलकाती सुख मेरे। मदिर ऊँघते रहते जब

बाल कहानी - गिरगिट का सपना

- मोहन राकेश एक गिरगिट था। अच्‍छा, मोटा-ताजा। काफी हरे जंगल में रहता था। रहने के लिए एक घने पेड़ के नीचे अच्‍छी-सी जगह बना रखी थी उसने। खाने-पीने की कोई तकलीफ नहीं थी। आसपास जीव-जन्‍तु बहुत मिल जाते थे। फिर भी वह उदास रहता था। उसका ख्‍याल था कि उसे कुछ और होना चाहिए था। और हर चीज, हर जीव का अपना एक रंग था। पर उसका अपना कोई एक रंग था ही नहीं। थोड़ी देर पहले नीले थे, अब हरे हो गए। हरे से बैंगनी। बैंगनी से कत्‍थई। कत्‍थई से स्‍याह। यह भी कोई जिन्‍दगी थी! यह ठीक था कि इससे बचाव बहुत होता था। हर देखनेवाले को धोखा दिया जा सकता था। खतरे के वक्‍त जान बचाई जा सकती थी। शिकार की सुविधा भी इसी से थी। पर यह भी क्‍या कि अपनी कोई एक पहचान ही नहीं! सुबह उठे, तो कच्‍चे भुट्टे की तरह पीले और रात को सोए तो भुने शकरकन्‍द की तरह काले! हर दो घण्‍टे में खुद अपने ही लिए अजनबी! उसे अपने सिवा हर एक से ईर्ष्‍या होती थी। पास के बिल में एक साँप था। ऐसा बढ़िया लहरिया था उसकी खाल पर कि देखकर मजा आ जाता था! आसपास के सब चूहे-चमगादड़ उससे खौफ खाते थे। वह खुद भी उसे देखते ही दुम दबाकर भागता था या मिट्टी के रंग में मिट्ट…

मनोहर अभय के नवगीत

(1) औरतरसातेरहे
कुनवापरस्तीमेंलगीथीधूपबूढ़ी कुनमुनेकिसलयठगे फूलथेबासी/औरमुरझातेरहे.
नवगीतलिखनाचाहते लिखगएकव्वालियाँ शर्मसारीपरनिरंतर पिटरही

कहानी - आख़िरी बातचीत

- लू शुन
पिताजी बहुत मुश्किल से ही साँस ले पा रहे थे। यहाँ तक कि उनकी सीने की धड़कन भी मुझे सुनाई नहीं दे रही थी। मगर अब शायद ही कोई उनकी कुछ मदद कर सकता था। मैं बार-बार यही सोच रहा था कि अच्छा हो, यदि वे इसी तरह शान्तिपूर्वक परलोक चले जाएँ। पर तभी अचानक मुझे लगा कि मुझे इस तरह की बातें नहीं सोचनी चाहिएँ। मुझे ऎसा लगने लगा मानो मैंने इस तरह की बात सोचकर कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो। लेकिन तब न जाने क्यों मुझे यह भी लगता था कि अपने मरते हुए पिता की शान्त-मृत्यु की कामना करना कोई ग़लत बात भी नहीं है। आज भी मुझे यह बात ठीक लगती है। उस दिन सुबह-सुबह हमारे घर के अहाते में ही रहने वाली श्रीमती येन हमारे पास आईं और पिता की हालत देखकर उन्होंने पूछा कि अब हम किस चीज़ का इन्तज़ार कर रहे हैं। अब समय बरबाद करने से क्या फ़ायदा। श्रीमती येन के कहने पर हमने पिता के कपड़े बदले। उसके बाद नोट और कायांग-सूत्र जलाकर उनकी आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना की। फिर उस राख को एक कागज़ में लपेटकर वह पुड़िया उनके हाथ में पकड़ा दी। - उनसे कुछ बात करो! श्रीमती येन ने कहा-  तुम्हारे बाबूजी का आख़िरी समय आ पहुँचा है…

सामाजिक दायित्व निर्वहन में समकालीन कविता की भूमिका

- डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव 
        समाजिक दायित्व के निर्वहन में समकालीन कविता की भूमिका पर विचार करने के पूर्व यह समझना आवश्यक प्रतीत होता है कि समकालीन कविता क्या है और सामाजिक दायत्वि क्या है। समकालीन कविता की कोई सार्वभौम परिभाषा नहीं है। अनेक विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से उसे परिभाषित करने का प्रयास किया है। किसी के अनुसार समकालीन कविता वह है जो पाठकों को यह बोध कराने में समर्थ हो कि वे किस माहौल में जी रहे हैं। डॉ यतीन्द्र तिवारी के शब्दों में समकालीन कविता समसामयिक समाज से उपजी आशाओं का बिम्ब है। वह एक अतिरिक्त यथार्थ और जीवन है जिसमें शाश्वत जीवन मूल्यों की मिठास और यथार्थ की कड़वाहट अर्थात दोनों की समरसता विद्यमान है इसीलिए इसमें काव्य का रसानन्द और जीवन सत्य की विभीषिकाओं से संघर्ष प्रेरणा दोनों मिलती हैं। कुछ के विचार से समकालीन कविता आदमी को आदमी बनाए रखने का संवेदनात्मक संवाद है और यह परम्परागत काव्यशास्त्रीय दायरों में बॅधकर लिखी जाने वाली कविता नहीं है। कुछ विचारक इसे काल-खण्ड से जोड़ते है अर्थात विगत 30-40वर्षों से जिस प्रकार की कविताएँ रची गई हैं और …