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एक कवि की दृष्टि से - कोहरा सूरज धूप (बृजेश नीरज)

"माँ! शब्द दो! अर्थ दो!” ये तीन पंक्तियाँ मिलकर एक छोटी सी कविता रच देती हैं। ये कविता उस यात्रा की शुरुआत है जिसका प्रारंभ घने कुहरे से होता है। हमारा अस्तित्व भी माँ से ही शुरू होता है। हमारे जीवन को पहला शब्द और पहला अर्थ माँ ही देती है। इसके बाद होती है जीवन-यात्रा जो अज्ञान के कुहरे से शुरू होती है।
बच्चे हर चीज को उसके स्वाद से पहचानने की कोशिश करते हैं। तब माँ सिखाती है कि हर चीज का स्वाद जुबान से नहीं लिया जा सकता। दुनिया को जानने-समझने के लिए आपको हर इंद्रिय का प्रयोग करना पड़ता है और किस वस्तु को किस इंद्रिय से महसूस किया जा सकता है यह माँ ही सिखाती है। माँ ज्ञान का सूरज भी है और आनंद की धूप भी। इस तरह ‘कोहरा सूरज धूप’ नामक कविता संग्रह की यात्रा शुरू होती है जो बृजेश नीरजजी के कल्पनालोक में ले जाती है।
अद्भुत बिम्बों से भरी सुबह हो रही है। यात्रा के प्रारंभ में ही कुछ द्वीप हैं जिनसे सटकर भगीरथी की धारा ठिठकी हुई है जिसकी स्याह लहरों में घुटकर रोशनी दम तोड़ देती है। निगाह नीले आसमान की तरफ जाती है और मन में सदियों पुराना प्रश्न सिर उठाता है। क्या होगा अंत के बाद?  सामने मो…

''कोहरा सूरज धूप'' लोकार्पित

अन्तराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के इलाहाबाद क्षेत्रीय केंद्र स्थित सत्यप्रकाश मिश्र सभागार में रविवार 22 फरवरी को आयोजित समारोह में अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबद द्वारा प्रकाशित साहित्य सुलभ संस्करण के प्रथम सेट की आठ पुस्तकों का लोकार्पण किया गया। इन आठ पुस्तकों में लखनऊ के बृजेश नीरज का कविता-संग्रह ‘’कोहरा सूरज धूप‘’ भी सम्मिलित है। लोकार्पण भोपाल से पधारे ख्याति प्राप्त शायर ज़हीर कुर्रेशी के हाथों संपन्न हुआ।समारोह की अध्यक्षता वयोवृद्ध गीतकार गुलाब सिंह ने की।कार्यक्रम का संचालन गीतकार नन्दल हितैषी ने किया। इस समारोह में गीतकार यश मालवीय, शायर एहतराम इस्लाम, प्रख्यात कवि अजामिल, उर्दू समालोचक एम . ए . कदीर, रविनंदन सिंह आदि वरिष्ठ साहित्यकार उपस्थित थे।समारोह में वक्ताओं ने बृजेश नीरज की कविताओं में समकालीनता के स्वर और उनके तेवर की सराहना की और उन्हें एक प्रगितशील और सशक्त रचनाकार बताया।वक्ताओं ने कहा कि बृजेश नीरज की कविताओं में जीवन के अनुभवों का एक विस्तृत फलक मौजूद है। समकालीन विषय नए स्वरुप में नवीन बिम्बों के साथ हमारे सामने है।समारोह का संयोजन अंजुमन प्रकाशन के अधिष्ठात…

कुंती मुखर्जी

कुंती मुखर्जी - संक्षिप्त परिचय
       कवयित्री एवं लेखिका कुंती मुखर्जी का जन्म 04 जनवरी 1956 को मॉरीशस द्वीप के फ़्लाक़ ज़िला स्थित ब्रिज़ी वेज़िएर नामक गाँव में हुआ था. फ़्रेंच भाषा के माध्यम से प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने हिंदी की पढ़ाई की. वर्ष 1972 में मॉरीशस हिंदी प्रचारिणी सभा द्वारा संचालित प्रयाग हिंदी साहित्य सम्मेलन की विशारद मध्यमा तथा 1973 में साहित्य रत्न उत्तमा परीक्षाएँ उत्तीर्ण की. उन्नीसवीं सदी के मध्य में अंग्रेज़ों द्वारा भारत से विस्थापित एक सम्पन्न परिवार की पाँचवी पीढ़ी की होनहार सदस्या के रूप में आपको भारतीय संस्कार विरासत में मिला. धार्मिक,देशभक्त व विद्वान पिता के संरक्षण और मार्गदर्शन में साहित्य जगत से परिचय हुआ. छह वर्ष की छोटी उम्र से ही आपकी लेखनी सक्रिय हो उठी थी. आपकी असंख्य रचनाओं में काव्य और कहानी ही मुख्य हैं. प्रकृति प्रेम से ओतप्रोत इन रचनाओं में नारी के  प्रति एक अतिसंवेदनशील रचनाकार के हृदय की छवि झलकती है.        विवाहोपरांत लेखिका वर्तमान में अधिकांश समय भारत में ही व्यतीत करती हैं. उनका काव्य-संग्रह “बंजारन” हाल ही में (2013) अंजुम…

मनोज शुक्ल का गीत

यूँ न शरमा के नज़रें झुकाओ प्रिये, मन मेरा बाबला है मचल जायेगा. तुम अगर यूँ ही फेरे रहोगी नज़र, वक़्त है वेवफा सच निकल जायेगा.
अब रुको थरथराने लगी जिंदगी, है दिवस थक गया शाम ढलने लगी. खड़खड़ाने लगे पात पीपल के हैं, ठंढी- ठंढी हवा जोर चलने लगी. बदलियाँ घिर गयीं हैं धुँधलका भी है, घन सघन आज निश्चित बरस जायेगा. तुम चले गर गए तन्हाँ हो जाउंगा, मन मिलन को तुम्हारे तरस जायेगा. तुम अगर पास मेरे रुकी रह गयीं, आज की रात ये दीप जल जायेगा. यूँ न शरमा.....................


मौन हैं सिलवटें चादरों की बहुत, रोकती-टोकती हैं दिवारें तुम्हें. झूमरे ताकतीं सोचतीं देहरियां, कैसे लें थाम कैसे पुकारें तुम्हें. रातरानी बहुत चाहती है तुम्हें, बेला मादक भी है रोकना चाहता, चंपा भी चाहता है तुम्हारी छुअन, बूढ़ा कचनार भी टोकना चाहता. गर्म श्वांसों का जो आसरा ना मिला, तो "मनुज " वर्फ सा आज गल जाएगा. यूँ न ...............


रुक ही जाओ अधर भी प्रकम्पित से हैं, ये नयन बेबसी से तुम्हें ताकते. वासना प्यार में आज घुलने लगी, ताप मेरे लहू का हैं क्षण नापते. मन है बेचैन तन भी है बेसुध बहुत,

नव वर्ष की शुभकामनायें!

सभी मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें!
- निर्झर टाइम्स टीम 

श्रीप्रकाश

संक्षिप्त परिचय- जन्म- 28 फरवरी 1959 शिक्षा- एम.ए. (हिंदी), कानपुर विश्वविधालय प्रकाशित कृतियाँ - सौरभ (काव्य संग्रह), उभरते स्वर, दस दिशाएं, सप्त स्वर इत्यादि काव्य संकलनों में तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतरजाल मंचों पर कवितायें/गीत/लेख आदि | सम्मान- निराला साहित्य परिषद् महमूदाबाद (सीतापुर), युवा रचनाकार मंच लखनऊ, अखिल भारत वैचारिक क्रांति मंच लखनऊ आदि संस्थाओं द्वारा सम्मानित | गतिविधियाँ- सचिव (साहित्य), निराला साहित्य परिषद् महमूदाबाद (उ.प्र.) एवं संस्थापक/निदेशक ‘ज्ञान भारती’ (लोक सेवी संस्थान) महमूदाबाद (उ.प्र.) | सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन ईमेल- sahitya_sadan@rediffmail.com

तीन मुक्तक - श्रीप्रकाश
विश्व को विश्व के चाह की यह लड़ी विश्व में चेतना प्राण जब तक रहे, प्रिय मधुप का कली पे बजे राग भी जब तलक गंध सौरभ सुमन में बहे ! *** प्यार छलता रहा प्रीति के पंथ पर दीप जलता रहा शाम ढलती रही, जिंदगी निशि प्रभा की मधुर आस ले रात दिन सी सरल साँस चलती रही ! *** नेह की गति नहीं है निरति अंक में काल की गति नहीं उम्र की गति नहीं, चाह की गति नहीं कल्प की गति नहीं रूप के पंथ पर तृप्ति की गति नहीं
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नूतन वर्ष मंगलमय हो !

वर्ष नया हो मंगलकारी, सुखी आपका हो जीवन दूर वेदनाएं हों सारी, रहे प्रफुल्लित हर पल मन !
मिले सफलता कदम-कदम पर, पूरी हों अभिलाषाएं कर्मयोग को साध्य बनाकर, अपना इच्छित फल पायें
बाहुपाश में जकड़ न पायें, असफलताओं के बंधन दूर वेदनाएं हों सारी, रहे प्रफुल्लित हर पल मन !
स्वार्थ, लोभ, आलस्य, क्रोध, कलुषित भावों से मुक्ति मिले जीवन के संघर्ष के लिए, अटल, असीमित शक्ति मिले !
मुक्त ईर्ष्या, द्वेष, घृणा से, हृदय आपका हो पावन दूर वेदनाएं हों सारी, रहे प्रफुल्लित हर पल मन !
मानवता की सेवा करना, निज जीवन का लक्ष्य बनायें अपना जीवन करें सार्थक, सारे जग में यश पायें !
मानवता पर हों न्योछावर, कर दें अपना तन,मन,धन दूर वेदनाएं हों सारी, रहे प्रफुल्लित हर पल मन !
नूतन वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं सहित- --राहुल देव-