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''कोहरा सूरज धूप'' लोकार्पित


 
अन्तराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के इलाहाबाद क्षेत्रीय केंद्र स्थित सत्यप्रकाश मिश्र सभागार में रविवार 22 फरवरी को आयोजित समारोह में अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबद द्वारा प्रकाशित साहित्य सुलभ संस्करण के प्रथम सेट की आठ पुस्तकों का लोकार्पण किया गया इन आठ पुस्तकों में लखनऊ के बृजेश नीरज का कविता-संग्रह ‘’कोहरा सूरज धूप‘’ भी सम्मिलित है लोकार्पण भोपाल से पधारे ख्याति प्राप्त शायर ज़हीर कुर्रेशी के हाथों संपन्न हुआ समारोह की अध्यक्षता वयोवृद्ध गीतकार गुलाब सिंह ने की कार्यक्रम का संचालन गीतकार नन्दल हितैषी ने किया  
इस समारोह में गीतकार यश मालवीय, शायर एहतराम इस्लाम, प्रख्यात कवि अजामिल, उर्दू समालोचक एम . ए . कदीर, रविनंदन सिंह आदि वरिष्ठ साहित्यकार उपस्थित थे समारोह में वक्ताओं ने बृजेश नीरज की कविताओं में समकालीनता के स्वर और उनके तेवर की सराहना की और उन्हें एक प्रगितशील और सशक्त रचनाकार बताया वक्ताओं ने कहा कि बृजेश नीरज की कविताओं में जीवन के अनुभवों का एक विस्तृत फलक मौजूद है समकालीन विषय नए स्वरुप में नवीन बिम्बों के साथ हमारे सामने है समारोह का संयोजन अंजुमन प्रकाशन के अधिष्ठाता एवं शायर वीनस केसरी ने किया

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भाषाओं का वैश्विक परिदृश्य और हिन्दी

- डा0 गोपाल नारायन श्रीवास्तव
जब हम भाषा के वैश्विक परिदृश्य की बात करते हैं तो सबसे पहले हमें भाषा विशेष की क्षमताओं के बारे में आश्वस्त होना पड़ता हैI वैश्विक धरातल पर कोई भी भाषा यूँ ही अनायास उभर कर अपना वर्चस्व नहीं बना सकतीI इसके पीछे भाषा की सनातनता का भी महत्वपूर्ण हाथ हैI स्वतंत्र भारत में जब पह्ला लोक-सभा निर्वाचन हुआ था उस समय हिन्दी भाषा विश्व में पाँचवे पायदान पर थीI आज उसे प्रथम स्थान का दावेदार माना जा रहा हैI अन्य बातें जिनकी चर्चा अभी आगे करेंगे उन्हें यदि छोड़  भी दें तो भाषा की वैश्विकता के दो प्रमुख आधार हैंI प्रथम यह कि आलोच्य भाषा कितने बड़े भू-भाग में बोली जा रही है और उस पर कितना साहित्य रचा जा रहा हैI दूसरी अहम् बात यह है कि वह भाषा कितने लोगों द्वारा व्यवहृत हो रही हैI इस पर विचार करने से पूर्व किसी भाषा का वैश्विक परिदृश्य क्या होना चाहिए और एतदर्थ किसी भाषा विशेष से क्या-क्या अपेक्षाएँ हैं, इस पर चर्चा होना प्रासंगिक एवं समीचीन हैI
      विश्व स्तर पर किसी भाषा के प्रख्यापित होने के लिए यह नितांत आवश्यक है कि उसका एक विशाल और प्रबुद्ध काव्य-शास्त्र हो,उसमें लेख…

ग़ज़ल में मात्राओं की गणना:

संदीप द्विवेदी (वाहिद काशीवासी)
आज के समय में हमारे देश में काव्य की अनेक विधाएँ प्रचलित हैं जो हमें साहित्य के रस से सिक्त कर आनंदित करती हैं। इनमें कुछ इसी देश की उपज हैं तो कुछ परदेश से भी आई हैं और यहाँ आकर यहाँ के रंग-ढंग में ढल गई हैं। ऐसी ही एक अत्यंत लोकप्रिय काव्य विधा है ग़ज़ल। हमारे समूह में ग़ज़ल की मात्राओं की गणना पर चर्चा करने के लिए मुझे आमंत्रित किया गया है अतः मैं बिना किसी लाग-लपेट के अपनी बात आरंभ करता हूँ।
ग़ज़लें कहने के लिए कुछ निश्चित लयों अथवा धुनों का प्रयोग किया जाता है जिन्हें 'बह्र' के नाम से जाना जाता है। अगर आपका लिखा या कहा हुआ काव्य बह्र में बद्ध नहीं है तो उसे ग़ज़ल नहीं माना जा सकता। बह्र में ग़ज़ल कहने के लिए हमें मात्राओं की गणना का ज्ञान होना आवश्यक है जिसे 'तक़्तीअ' कहा जाता है। अगर हम तक़्तीअ करना सीख लेते हैं तो फिर बह्र भी धीरे-धीरे सध जाती है। हिंदी छंदों के विपरीत, जहाँ वर्णिक छंदों (ग़ज़ल भी वर्णिक छंद ही है) गणों के निश्चित क्रम निर्धारित होते हैं और हर मात्रा का अपने स्थान पर होना अनिवार्य होता है, ग़ज़ल की बह्र में मात्राओं की गणना में छूट…

हे प्रभु आनंद दाता

हे प्रभु!आनंद दाता!!ज्ञान हमकोदीजिये| शीघ्र सारेदुर्गुणोंको दूर हमसेकीजिये|| हे प्रभु…
लीजियेहमको शरण में हम सदाचारीबनें| ब्रह्मचारीधर्मरक्षकवीरव्रतधारीबनें|| हे प्रभु…
निंदाकिसी कीहमकिसीसेभूल कर भी न करें| ईर्ष्या कभी भी हमकिसीसेभूल कर भी न करें|| हे प्रभु………
सत्य बोलें झूठ त्यागें मेल आपस में करें| दिव्य जीवन हो हमारा यश तेरा गाया करें|| हे प्रभु………
जाये हमारी आयु हे प्रभु!लोक के उपकार में| हाथ ड़ालें हम कभी न भूलकर अपकार में|| हे प्रभु………
कीजियेहम पर कृपा ऐसी हे परमात्मा! मोह मदमत्सररहित होवे हमारी आत्मा || हे प्रभु………
प्रेम से हमगुरुजनोंकी नित्य ही सेवा करें | प्रेम से हम संस्कृति की नित्य ही सेवा करें|| हे प्रभु…
योगविद्याब्रह्मविद्याहो अधिक प्यारी हमें |