Tuesday, 27 December 2016

Posted by Lokoday Prakashan On 22:02
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- शानी

अपने बर्फ जैसे हाथों से वाहिद ने गर्दन से उलझा हुआ मफलर निकाला और साफिया की ओर फेंक दिया। पलक-भर वाहिद की ओर देखकर साफिया ने मफलर उठाया और उसे तह करती हुई धीमे स्वर में बोली, 'क्या मीलाद में गए थे?'
वाहिद ने बड़े ठंडे ढंग से स्वीकृतिसूचक सिर हिलाया और पास की खूँटी में कोट टाँग खिड़की के पास आया। खिड़की के बाहर अँधेरा था, केवल सन्नाटे की ठंडी साँय-साँय थी, जिसे लपेटे बर्फीली हवा बह रही थी। किंचित सिहरकर वाहिद ने खिड़की पर पल्ले लगा दिए और अपने बज उठते दाँतों को एक-दूसरे पर जमाते हुए बोला 'कितनी सर्दी है! जिस्म बर्फ हुआ जा रहा है, चूल्हे में आग है क्या?'
प्रश्न पर साफिया ने आश्चर्य से वाहिद की ओर देखा। बोली नहीं। चुपचाप खाट पर लेटे वाहिद के पास आई, बैठी और उसके कंधे पर हाथ रखकर स्नेह-सिक्त स्वर में बोली, 'मेरा बिस्तर गर्म है, वहाँ सो जाओ।'
वाहिद अपनी जगह लेटा रहा, कुछ बोला नहीं। थोड़ी देर के बाद उठकर पास ही पड़ी पोटली खींची, उसकी गाँठें खोली और कागज की पुड़िया रूमाल से अलग कर बोला, 'शीरनी है, लो खाओ।'
'रहने दो,' साफिया बोली 'सुबह खा लूँगी। क्या मीलाद में बहुत लोग थे? किसके यहाँ थी?'
'वकील साहब के यहाँ। एक तो ग्यारहवें शरीफ की मीलादें और दूसरे इतनी सर्दी।'
वाहिद ने रजाई गर्दन तक खींच ली। अनायास भर उठने वाली झुरझुरी से एक बार सिहर कर अपना जिस्म समेटा और एक कोने में हो रहा। बंद किवाड़ों को धक्का मारकर अँधेरे और शीत में ठिठुरती हवा लौट गई और किवाड़ों की दराज में सिमटकर हवा दोशीजा की नटखट छुअन की तरह गर्म रजाई में भी वाहिद को छूकर कँपा गई।
पास वाले मकान से एक शोर उठ रहा था, एक बड़ी मीठी चहल-पहल, जिसमें पुरुष-स्त्रियों के स्वर और हँसी-मजाक के फव्वारे, देगों की उठा-पटक बल्लियों और कफगीरों के टकराने और झनझनाने की आवाजों के साथ घुले-मिले थे।
सफिया ने कहा 'मुनीर साहब के यहाँ कल सुबह दावत है।'
वाहिद ने सुन-भर लिया और आँखें बंद कर लीं।
मुनीर साहब वाहिद के घर के पास ही रहते थे। आज से कोई छह साल पहले मुनीर साहब यहाँ मुनीम थे, पर बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और गल्ले का व्यापार शुरू कर दिया। किस्मत अच्छी थी, अतः दो साल के अंदर ही उन्होंने हजारों रुपए कमाए और अपना पुराना माटी का कच्चा मकान तुड़वाकर पक्का और बड़ा मकान बनवाया।
उस दावत की चर्चा वाहिद पिछले कई दिनों से सफिया से सुन रहा था। मुनीर साहब की पत्नी ने जो, अक्सर वाहिद के यहाँ दोपहर में आ जाया करती थी, दो हफ्ते पहले ही अपने यहाँ होने वाली दावत की घोषणा कर दी थी। जब कभी सफिया से भेंट हुई, थोड़ी इधर-उधर की चर्चा के पश्चात बात ग्यारहवीं शरीफ के महीने, मीलादों और दावतों पर पलट आई और उसने बातों ही बातों में कई बार सुनाया कि उनके यहाँ की दावत में कितने मन का पुलाव, कितना जर्दा और कितने मन के बकरे कटने को हैं और इतने दिन पहले ही उनके रिश्तेदार चावल-दाल चुनने-बीनने और दूसरे कामों के लिए आ गए हैं। इस जरूरत से ज्यादा इंतजाम करने के लिए उन्होंने सफाई दी कि मीलाद, तीजा और किसी धार्मिक काम में चाहे लोग न आएँ, पर खाने की दावत हो, तो एक बुलाओ, चार आएँगे। जब मामूली दावतों का यह हाल होता है तो यह तो आम दावत है।
सफिया को बुरा लगा हो, ऐसी बात नहीं, पर उसने कभी कुछ नहीं कहा।
वही दावत कल होने जा रही थी।
बड़ी देर से छा गई चुप्पी को सहसा तोड़कर बड़े निराश स्वर में सफिया बोली 'मुनीर साहब की बीवी के पाँव तो जमीन पर ही नहीं पड़ते । इतनी उम्र हो गई फिर भी जेवरों से लदी पीली-उजली दुल्हन बनी फिरती हैं। भला बहू-बेटियों के सामने बुढ़ियों का सिंगार क्या अच्छा लगता है।'
वाहिद ने करवट बदली और एक लंबी साँस लेकर कहा 'जिसे खुदा ने इतना दिया है, वह क्यों न पहने? अपने-अपने नसीब हैं सफिया।'
सफिया को संतोष नहीं हुआ। थोड़ी देर चुप रहकर बड़े भरे हुए स्वर में बोली 'एक अपने नसीब हैं, खुदा जाने तुम्हारे मुकदमे का फैसला माटी मिला कब होगा!' और सफिया के भीतर से बड़ी लंबी और गहरी साँस निकली जो सीधे वाहिद के कलेजे में उतर गई।

वाहिद एक ढीला-ढाला, मँझोले कद का आदमी था। गरीबी और अभाव से उसका परिचय बचपन से ही था। बड़ी आर्थिक कठिनाइयों के बीच आठवीं की शिक्षा प्राप्त कर सका था। आठवीं के बाद किसी तरह कोशिश कर-कराके उसे फारेस्ट डिपार्टमेंट में फारेस्ट गार्ड की नौकरी मिल गई और आठ साल के भीतर ही वह डिप्टी रेंजर तक पहुँच गया। जंगल महकमे वालों को भला किस चीज की कमी। चार साल के अंदर ही वाहिद के नाम पोस्ट ऑफिस में डेढ़ हजार की रकम जमा हो गई जिसमें से सात सौ उसके ब्याह में खर्च हुए। पर सफिया का भाग्य शायद अच्छा नहीं था। पूरे दो साल भी सुख से नहीं रह पाई थी कि वाहिद को रिश्वत के आरोप में मुअत्तल कर दिया गया। वाहिद ने बहुत हाथ-पाँव मारे। पोस्ट ऑफिस से तीन सौ और निकल गए। हेड क्लर्क की कई दावतें हुईं। रेंज आफिसर साहब (जिनके सर्किल में वाहिद आता था और जिन्होंने रिपोर्ट आगे बढ़ाई थी) के यहाँ उसने कई बार, मिठाई, फलों की टोकरियाँ और शहर के भारी-भरकम आदमियों से ढेर सारी सिफारिशें भिजवाईं और डी.एफ.ओ. साहब की बीवी के पास (हालाँकि उसके पहले एक बार भी वहाँ जाने का अवसर नहीं आया था) सफिया को दो-तीन बार भेजा, पर कुछ नहीं हुआ। केस पुलिस को दे दिया गया और वाहिद पर मुकदमा चलने लगा।
पहले कुछ महीने तो वाहिद को काफी सांत्वनाएँ मिलीं  कि केस में कोई दम नहीं, खारिज हो जाएगा। यहाँ वाले ज्यादती और अन्याय करें पर ऊपर तो सबकी चिंता रखने वाला है और वाहिद के केस के साथ अकेले वाहिद का नहीं दो और जनों का भाग्य जुड़ा है। अगर वाहिद दोषी भी है, तो वे लोग तो निर्दोष हैं इत्यादि।
जब एक साल का अर्सा बीत जाने पर मुकदमा तय नहीं हुआ, पोस्ट आफिस से पूरे पैसे निकल गए और सफिया के जिस्म पर एक भी जेवर न रहा तो वाहिद की हिम्मत टूट गई और पहले जुम्मे के अलावा कभी भी मस्जिद की ओर रुख न करने वाला वाहिद अब पाँचों वक्त नवाज पढ़ने लगा।
लगभग दो साल के बाद फैसला हुआ और आशा के विपरीत, अच्छे से अच्छा वकील लगाने के बावजूद, वाहिद को साल भर की सजा हो गई।
वैसे तो अकस्मात टूट पड़ने वाली मुसीबत पहाड़ से कम न थी पर रिश्तेदारों और दोस्तों ने हाईकोर्ट में अपील करने का किसी-न-किसी तरह प्रबंध कर दिया और पूरे डेढ़ बरस से वाहिद हाईकोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहा है, भले उस प्रतीक्षा में एक जून के खाने के बाद दूसरे जून की चिंता की हड़बड़ाहट, सफिया की शिकायतें, दिन-प्रतिदिन टूटता उसका स्वास्थ्य और उस दुर्दिन में माँ बनने की एहतियात, आवश्यक दवाई व देखभाल की सारी समस्याएँ शामिल थीं।

मुनीर साहब के यहाँ से देगों में भारी कफगीरों के फेरने-टकारने का स्वर गूँजा, बड़े जोर से छनन-छन्न की आवाज हुई और फिर घी में पड़े ढेर सारे मसालों की मीठी-सोंधी खुशबू फैल गई।
घी अब वाहिद के लिए ख्वाब है। जब तक लोअर कोर्ट से फैसला नहीं हुआ था, ऑफिस से मुअत्तली का एलाउंस मिल जाया करता था, उसका ही सहारा कम न था। पर अब कहीं का कोई आसरा नहीं। उन कड़वे दिनों को वाहिद और सफिया मिलकर झेल भी लें, लेकिन उस मासूम जान का क्या होगा, जो वाहिद के दुर्दिन में ही सफिया के भाग्य में आने को थी? प्राइवेट फंड की जो भी थोड़ी बहुत रकम जमा थी और वापस मिलने को थी, उसके जाने के बहुत पहले से रास्ते तैयार थे, अतः उसका क्या भरोसा?
एक दिन झिझकती हुई सफिया बोली 'एक बात कहूँ?'
पल भर के लिए वाहिद डर सा गया, पता नहीं सफिया कौन-सी बात कहेगी? तुरंत जवाब देते नहीं बना। क्षण भर उसकी तरफ देखता रहा फिर पास जाकर अपनी हथेलियों में उसका चेहरा ले बड़ी उदास आँखों से देखने लगा 'क्या कहती हो?'
सफिया बोली 'प्राइवेट फंड के पैसे मिलेंगे, तो घी ला दोगे? बहुत दिनों से अपने यहाँ पुलाव नहीं बना।'
वाहिद के भीतर जैसे किसी ने हाथ डालकर खँगाल दिया हो। अपने को किसी तरह पहले वह संयत कर धीरे से मुस्कराया, फिर जरा जोर से बनाई हुई हँसी हँसता हुआ बोला 'बस?'
सफिया संकोच से लाल होकर मुस्कराती हुई वाहिद के सीने में छिप गई।
वहाँ से हटकर जब वाहिद दूसरे कमरे में आ गया तो निढाल सा खाट में पड़ गया। भीतर से उफनती रुलाई का आवेग पलकों पर, ओठों पर बिछल रहा था। मुँह पोंछने के बहाने रुमाल से उसने आँखें पोंछीं और अपने लरज रहे ओंठ बाँहों में भींच लिए।
उस बात को भी तीन माह हो गए थे। सफिया ने एक-दो बार अप्रत्यक्ष रूप से पूछने की कोशिश की और चुप रह गई। उस रकम की वाहिद को आज भी प्रतीक्षा है।
वाहिद ने करवट बदली। मुनीर साहब के यहाँ का शोर थम गया था और इक्की-दुक्की आवाजें आ रही थीं। सफिया थककर सो गई थी।

सर्दी की सुबह वाहिद के लिए आठ से पहले नहीं होती। पर उस दिन देर से सोने पर भी आँख सुबह जल्दी खुल गई। वैसे काम होने या न होने पर भी वह चाय आदि से निपटकर नौ से पहले ही बाहर निकल जाता है लेकिन उस दिन उसकी चाय दस बजे हुई।
बाहर मुनीर साहब के यहाँ भीड़ इकट्ठी हो रही थी साइकिल और पाँवों की रौंद से उभड़-उभड़कर धूल का बादल फैल-बिखर रहा था और दिनों की तरह चाय देते हुए आज सफिया ने न तो राशन के समाप्त होने की बात कही और न पूछा कि आज वाहिद कहाँ से क्या प्रबंध करेगा। पिछली रात भी कुछ नही था। सुबह का बच रहा थोड़ा खाना वाहिद और सफिया ने मिलकर खा लिया था। रात की मीलाद की शीरनी नाश्ते का काम दे गई थी।
वाहिद ने पूछा 'क्यों, क्या मुनीर साहब के यहाँ से कोई आया था?'
सफिया ने थोड़ा झिझकते हुए जवाब दिया 'नहीं, हज्जाम आया था, आम दावत की खबर दे गया है।'
वाहिद ने और कुछ नहीं पूछा और बाहर निकल आया। मुनीर साहब के घर के सामने से लेकर दूसरे मोड़ तक लोगों का आना-जाना लगा था। रंगीन धारीदार तहमत लपेटे, सफेद और काली टोपियाँ लगाए, सिर में रूमाल बाँधे लोग, मुनीर साहब के घर की ओर बढ़ रहे थे। एकाएक सामने से रिजवी साहब दिखाई दिए। वाहिद उनसे कतराना चाहता था पर जब सामने पड़ ही गए, तो बरबस मुस्कराकर आदाब करना ही पड़ा। रिजवी साहब के साथ नौ से लेकर तीन साल तक के चार बच्चे चल रहे थे, जिनके सिर पर आढ़ी-टेढ़ी, गंदी और तेल में चीकट मुड़ी-मुड़ाई टोपियाँ थी।
रिजवी साहब ने मुस्कराकर पूछा 'क्यों भाई, मुनीर साहब के यहाँ से आए हो क्या?'
वाहिद ने झिझककर कहा 'जी नहीं।'
वाहिद से रिजवी साहब बोले 'तो फिर चलो न?'
वाहिद क्षण भर चुप रहा। फिर सँभलकर बोला 'आप चलिए, मैं अभी आया।'
रिजवी साहब आगे बढ़ गए।
कोई दो घंटों के बाद जब वाहिद लौटा, तो मुनीद साहब के घर के सामने से भीड़ छँट गई थी, पर महफिल अभी भी चल रही थी। कोई पूछे या न पूछे, स्वागत करे या न करे, लोग आते, सामने के नल पर हाथ धोते और बैठ जाते थे।
एक ओर से कंधे पर कपड़े से ढका तश्त लिए, चिंचोड़ी गई हड्डियों के गिर्द फैले ढेर सारे कुत्तों को हँकालती हमीदा की माँ निकली। हमीदा की माँ पिछले पाँच वर्षों से मुनीर साहब के यहाँ नौकर थी। अक्सर तीज-त्यौहारों के अवसर पर मुनीर साहब के यहाँ से शीरनी लेकर हमीदा की माँ वाहिद के यहाँ आया करती थी। उससे बात करने की न तो वाहिद को ही कभी आवश्यकता पड़ी और न अवसर ही आया। फिर भी वाहिद ने आज रोककर पूछा 'हमीदा की माँ, क्या लिए जा रही हो?'
हमीदा की माँ ने पल्लू सँभालकर कहा 'खाना है भैया, सिटी साहब के यहाँ पहुँचाने जा रही हूँ।'
'भला वह क्यों?'
'अब पता नहीं, सिटी साहब आम दावत में आना पसंद करें, न करें, सो बेगम साहबा भिजवा रही हैं।'
और हमीदा की माँ आगे बढ़ने लगी, तभी एकाएक चौंककर, (जैसे कोई महत्वपूर्ण और विशेष बात छूटी जा रही हो) जरा आवाज ऊँची करके, रोकने के अंदाज में वाहिद ने पूछा, 'और कहाँ-कहाँ ले जाना है हामिद की माँ?'
हामिद की माँ ने थोड़ा रुककर कहा 'पता नहीं भैया! फिर भी इतना जानती हूँ, अभी मेरी जान को छुटकारा नहीं।'
वाहिद ओठों में ही मुस्कराया और मुनीर साहब के घर की ओर बढ़ा। सामने आँगन में दो-तीन बड़ी-बड़ी दरियाँ (जो संभवतः हर दावत में पहुँच-पहुँच कर गंदी हो चली थीं) बिछी हुई थीं, जिन पर साफ, नए कपड़े पहने कुछ बच्चे खेल रहे थे। पास के नल से क्षण-प्रतिक्षण बह रहे पानी से आँगन के आधे हिस्से में कीचड़ फैल चुका था। पास ही दो-तीन चारपाइयाँ डाल दी गई थीं। चारपाइयाँ शायद उन उम्मीदवारों के बैठने के लिए जो देर से आने के कारण चल रही पाँत समाप्त होने और दूसरी पाँत के प्रारंभ होने की प्रतीक्षा करते हैं। उन्ही लोगों में से क्या वाहिद भी है? वह बड़े फीके ढंग से मन-ही-मन हँसा। रस्सी भले ही जल गई हो, पर क्या उसका बल इतनी जल्दी निकल जाएगा।
थोड़ी देर वाहिद वहीं खड़ा रहा। वहाँ बैठने-बिठाने अथवा पूछने के लिए किसी की आवश्यकता नहीं थी। लोग आते थे, जाते थे।
भीतर के कमरे से जहाँ खाना चल रहा था, बर्तनों की टकराहट के साथ पुलाव की महक साँसों के साथ वाहिद के फेंफड़ों में भर गई। मुँह भर आया, घूँट हलक के नीचे उतारकर वाहिद एक ओर खड़े दाँत खोदते औक थूकते दो-तीन दाढ़ी वाले बुजुर्गों के पास जा खड़ा हुआ। दाँत के अँतरों में फँस गए गोश्त के टुकड़ों को तीली से निकाल फेंकने की जी-तोड़ कोशिश करते हुए उन लोगों ने केवल वही सवाल किया, जिसका जवाब वाहिद पिछले डेढ़ बरस से प्रायः हर मिलने वाले को दिया करता था कि उसके केस का क्या हुआ, किस वकील को लगाया है, कितनी परेशानियाँ हो गई और अपील के फैसले को कितनी देर है? आदि।
वाहिद ने सैकड़ों बार कही बात एक बार फिर अपने अनमने ढंग से दोहरा दी। तबी दरवाजे के पास मुनीर साहब दिखाई दिए। इधर से ध्यान हटाकर वाहिद ने मुनीर साहब के चेहरे की तरफ अपनी आँखें जमा दी। पर लगातार कई मिनटों तक मुनीर साहब के चेहरे की तरफ देखते रहने पर भी उनका ध्यान वाहिद की तरफ नहीं लौटा और वह अपने किसी नौकर को हिदायतें देकर लौटने लगे, तो अपनी जगह से एकदम आगे आ, पुकारकर वाहिद ने कहा, 'मुनीर साहब, आदाब अर्ज है।'
मुनीर साहब जाते-जाते पल भर को रुके, आदाब लिया, वाहिद की ओर देखकर मुस्कराए और तेजी से भीतर चले गए।
एक दम पीछे अपनी जगह से लौटने से पूर्व वाहिद ने सुना, पास के दाढ़ी वाले सज्जन उसका नाम लेकर पुकार रहे थे। लौटकर देखा तो उन्होंने कहा 'वाहिद मियाँ, पान लीजिए।'
एक कम उम्र का लड़का वाहिद के आगे पान की तश्तरी बढ़ाए खड़ा था। क्षण भर रुककर वाहिद ने अपने इर्द-गिर्द देखा, सामने खड़े लड़के पर एक निगाह डाली, तश्तरी से एक पान उठाकर मुँह में रखा और लौट रहे लोगों के पीछे हो लिया।
घर पहुँचकर देखा, सफिया तकिए में मुँह डाले चुपचाप पड़ी थी। बावर्चीखाने की ओर निगाह गई, चूल्हा लिपा-पुता साफ था और धुले-मँजे बर्तन चमक रहे थे। वाहिद को देखकर सफिया उठ बैठी और अपनी ओर घूरकर देख रहे वाहिद की आँखों में केवल निमिष-भरे के लिए देखकर ठंडे स्वर में पूछा 'कितने लोग थे दावत में?
हामिद की माँ तो आई नहीं?'

वाहिद के जले पर जैसे किसी ने नमक छिड़क दिया हो। तिलमिलाकर तीखे स्वर में उसने कहा, 'हमीदा की माँ की ऐसी की तैसी! मैं ऐसी दावतों में नहीं जाता, यह जानकर भी तुम ऐसे सवाल करती हो? हमने क्या पुलाव नहीं खाया? जिसने न देखा हो वह सालों के यहाँ जाए!'

1 comment:

  1. कहानी बहुत अच्छी लगी, लेखक को हार्दिक बधाई

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