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Showing posts from November, 2014

'सारांश समय का' लोकार्पण समारोह

'शब्द व्यंजना' और 'सन्निधि संगोष्ठी' के संयुक्त तत्वाधान में दिनांक 22/11/2014 को अपराह्न 01.30 बजे से सायं 6:00 बजे तक कमरा न. 203, अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन केन्द्र, जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में 'सारांश समय का' साझा कविता-संकलन का विमोचन/ लोकार्पण समारोह तथा काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया।
बृजेश नीरज जी व अरुन शर्मा अनंत जी द्वारा सम्पादित 80 रचनाकारों की पुस्तक की एक सहभागी आपकी दोस्त "नीलू 'नीलपरी" भी है।
मुख्य अतिथि रमणिका गुप्ता जी, लक्ष्मीशंकर बाजपेयी जी, धनञ्जय सिंह जी, प्रसून लतांत जी रहे। मंच की संचालिका महिमा ने अपना कार्य बखूबी निभाया। किरण आर्या के संयोजन से सारा समारोह बहुत अच्छा बन पड़ा। कविता, शायरी, ग़ज़ल, कुण्डलिया आदि की स्वर लहरी से समां बंध गया। उपस्थित रचनाकारों के साथ हमने भी काव्य पाठ किया। वरिष्ठ कवि और मेरे बाबा धनञ्जय सिंह जी और बृजेश नीरज जी से प्रथम बार मिलना बहुत सुखद रहा। मेरे फेसबुक मामू अशोक अरोरा जी की उपस्थिति सुखकर लगी।
राहुल पुरुषोत्तमद्वारा कैमरे में कैद की कुछ फ़ोटो साझा कर रही हूँ। - नीलू नीलपरी 





आन्ना अख़्मातवा

आन्ना अख़्मातवा
जन्म: 11 जून 1889 निधन: 5 मार्च 1966 उपनाम  आन्ना अख़्मातवा जन्म स्थान  ओडेसा, उक्राइना।
मैं तुम्हारी जगह लेने आई हूँ, सखी! 
तुम्हारी जगह लेने आई हूँ, सखी! धधकते दावानल के बीच - मैं तुम्हारी जगह लेने आई हूँ, सखी !
तुम्हारी आँखों की ज्योति मन्द पड़ गई है आँसू भाप बन कर उड़ गए हैं बादल सरीखे और बालों से झलकने लगा है उम्र का भूरापन।
तुम समझ नहीं पा रही हो चिड़िया का गाना न तो सितारों की सरगोशियाँ और न ही दामिनी की द्युति का दर्प।

हमारे रचनाकार- अरुन श्री

जन्म तिथि- २९.०९.१९८३
शिक्षा- बी. कॉम., डिप्लोमा इन कंप्यूटर एकाउंटिंग
प्रकाशित कृतियाँ- मैं देव न हो सकूँगा (कविता संग्रह), परों को खोलते हुए (संयुक्त काव्य संग्रह), शुभमस्तु (संयुक्त काव्य संग्रह), सारांश समय का (संयुक्त काव्य संग्रह), गज़ल के फलक पर (संयुक्त गज़ल संग्रह)
पता- मुगलसराय, उत्तर प्रदेश
मोबाइल- 09369926999
ई-मेल- arunsri.adev@gmail.com

अरुन श्री की कविताएँ 
मैं कितना झूठा था !!
कितनी सच्ची थी तुम, और मैं कितना झूठा था!!!
तुम्हे पसंद नहीं थी सांवली ख़ामोशी! मैं चाहता कि बचा रहे मेरा सांवलापन चमकीले संक्रमण से! तब रंगों का अर्थ न तुम जानती थी, न मैं!
एक गर्मी की छुट्टियों में - तुम्हारी आँखों में उतर गया मेरा सांवला रंग! मेरी चुप्पी थोड़ी तुम जैसी चटक रंग हो गई थी!
तुम गुलाबी फ्रोक पहने मेरा रंग अपनी हथेली में भर लेती! मैं अपने सीने तक पहुँचते तुम्हारे माथे को सहलाता कह उठता - कि अभी बच्ची हो! तुम तुनक कर कोई स्टूल खोजने लगती!
तुम बड़ी होकर भी बच्ची ही रही, मैं कवि होने लगा! तुम्हारी थकी-थकी हँसी मेरी बाँहों में सोई रहती रात भर! मैं तुम्हारे बालों में शब्द पिरोता, माथे पर कविताएँ लिखता!
एक कर…