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Showing posts from August, 2013

आओ गति दें...

नमस्कार सुहृद साहित्यप्रेमियों... 
भारतीय साहित्य में अनेक ललित विधाएं हैं,जिनमें साहित्य के पुरोधा तो अपनी लेखनी से लालित्य विखेरते ही रहे हैं, हमारे युवा साथी भी पीछे नहीं हैं। इतने मनोरंजक संसाधनों की भरमार और समय की कमी के चलते भी उनका अध्ययन और लेखन के प्रति उत्साह प्रशंसनीय है। आज हम एक सार्वभौम विधा पर नजर डालते हैं जो विश्व की अनेक भाषाओं में अपना परचम फहरा चुकी है,लेकिन दुखद है कि हिंदी में कोई विशेष उपलब्धि नहीं अर्जित कर सकी। उसका चिर परिचित नाम है- 'सानेट'। हिंदी में त्रिलोचन जी ने शुरुआत की,नामवर सिंह जी ने भी कुछ प्रयास किये,फिर बहुत आगे नहीं बढ सकी। इस समय सानेट का कुछ अस्तित्व फिर उभरता हुआ नजर आ रहा है, आपका सहयोग आशातीत है। हिंदी सानेट को समझें,लिखें और गति दें...इटैलियन,अंग्रेजी,फ्रेंच,आदि अनेक भाषाओं के बाद अब हमारी(हिंदी)बारी है। जहाँ तक मेरे संज्ञान में है आदरणीय बृजेश महोदय ओबीओ मंच के माध्यम से खासी पहल कर रहे हैं,हम सबका सहयोग भी आवश्यक है। इसी शुभेच्छा के साथ चलते हैं आपके सुरम्य सूत्रों पर-


Voice of Silent Majority 
सॉनेट: एक परिचय
प्रस्तावना- साहित्य…

साहित्यिक अंजुमन में मानोशी का उन्मेष

कविता सिर्फ भावाभिव्यक्ति नहीं होती बल्कि वह कवि की दृष्टि और अनुभूतियों से भी पाठक का परिचय कराती है। रचना में कवि का अस्तित्व तमाम बंधनों को तोड़कर बाहर प्रस्फुटित होता है। उसके द्वारा चुने गए शब्द उसके भावों को जीते हैं और उस चित्र को साक्षात पाठक के समक्ष जीवंत करते हैं जो कहीं दूर उसके मन के भीतर रचा-बसा और दबा होता है।       छत्तीसगढ़ के कोरबा शहर में जन्मी और वर्तमान में कनाडा में रह रही नवोदित रचनाकार मानोशी का अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद से प्रकाशित कविता संग्रह ‘उन्मेष’ मुझे प्राप्त हुआ। बंगाली साहित्य ने उन्हें साहित्य के प्रति प्रेरित किया। गायन में संगीत विशारद की उपाधि प्राप्त चुकी मानोशी के गीतों में उनका संगीत ज्ञान स्पष्ट परिलक्षित होता है। गीतों में उनकी पकड़ इतनी सशक्त है कि भाव स्वयं शब्द का रूप लेकर अभिव्यक्त हो जाते हैं। यह उदाहरण देखें- ‘इक सितारा माथ पर जो, उमग तुमने जड़ दिया था और भॅंवरा रूप बनकर, अधर से रस पी लिया था उस समय के मद भरे पल, ज्यों नशे में जी रही हूँ'
      उन्मेष में संग्रहीत 30 गीतों, 21 गज़लों, 10 मुक्तछंद, 8 हाइकू रचनायें, 6 क्षणिकाएं और दो…

अनुभूति मनोरम..

आदरणीय सुधीवृन्द सादर वन्दे! 
मित्रों सावन चल रहे हैं, ग्रामीण अंचल में जहाँ देखो हरियाली ही हरियाली... कहीं झूले पर गीत गाती किशोरियां तो कहीं हरी हरी चूड़ियां खनकाती वधुएं... मेंहदी की खुशबू से तो परिवेश ही महक रहा है। बहनें भाइयों के लिए हर दिन पूजा अर्चन कर उनकी कुशलता के विनय में तल्लीन हैं तो भाईयों के हृदय भी बहनों के लिए अगाध प्रेम छलका रहे हैं। तीर्थ स्थल की सड़कें, शिव जी के स्थान कांवरियों के श्रद्धा-रंगों से सराबोर है। वास्तव में कितना मनोरम है ये सब! इस परिवेश से आनन्दित होने के बाद एक प्रश्न अन्त:करण को कचोटता है कि कहीं शहरों की तरह गाँव से भी तो नहीं रम्यता छिन जाएगी?? यहाँ की भी आन्तरिक प्रफुल्लता कहीं औपचारिका में तो नहीं बदल जाएगी?? खैर.. जो भी समय आएगा हमें उसका पहलू तो बनना ही पड़ेगा! हमें विज्ञान-जनित साधनों में ही प्राकृतिक सौंदर्य की अनुभूति करनी ही पड़ेगी। 
अब चलते हैं आपके ही साहित्यिक सूत्रों पर जो साहित्य को मनोरम बना रहे हैं-

ॐ ..प्रीतम साक्षात्कार ..ॐ : हरियाली तीज:  असल में हर त्योहार या उत्सव को मनाने के पीछे के पारंपरिक तथा सांस्कृतिक कारणों के अलावा एक और…

रचनाशीलता की पहुंच कहाँ तक???

वन्देऽमातरम्... सुहृद मित्रों! 
आज का समय अनेक विसंगतियों से जूझ रहा है। पूंजीवीदी विकास की अवधारण और वैश्वीकरण नें समाज में गहरी खांइयां डाल दी हैं। सदियों से हमारे देश की पहचान रहे गाँव, किसान हमारी अद्वितीय संस्कृति पर संकट के घनघोर बादल मंडरा रहे हैं। संस्कृति जिसके बूते हमारे राष्ट्र की पताका विश्व में फहराया करती थी, आज... पाश्चात्य के अन्धेनुकरण की दौड़ में रौंदी जा रही है। जब सभी मनोरंजन के साधन उबाऊ सिद्ध हो रहे है।ईमानदार, नि:सहाय और आदमी की सुनने वाला कोई नहीं रहा। ऐसे अराजक और मूल्यहीन विकृत मंजर में दर-दर से ठुकराई दमन के हाशिए पर खड़ी आत्मा की अन्तिम शरणस्थली बचती है तो एकमात्र साहित्य! आज की साहित्य-धर्मिता में ऐसी क्षमता है जो इस स्थिति में मानव-हृदय को सहलाने वाला साहित्य प्रस्तुत कर सके? ये एक यक्ष प्रश्न है। आज के साहित्य में क्या ऐसे नि:सहाय पात्रों को स्थान मिलता है? क्या उन दमित आवाजों को उजागर कर सकता है जिनका सुनने वाला कोई नहीं? ऐसे कई प्रश्न साहित्य-धर्मिता/रचनाशीलता के पल्ले में हैं। मुंशी प्रेमचंद ने कहा है-''साहित्य की गोद में उन्दे आश्…