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Showing posts from January, 2013

आस्था

यह यशोदा जी की पहली कविता है।

हे ईश्वर..... सदियों से बने हुए हो मूर्ति तुम....  ........... तुम्हें परोस कर खिलाने का बहाना अब त्याग दिया     लोगों ने .... अब नोच-नोच कर खाने लगे हैं तुम्हें ही  तुम पर आस्थावान लोगों को      मोहरा बनाकर .....          - यशोदा

इक चमेली के मंडवे तले

          - मख़दूममोहिउद्दीन

इकचमेलीकेमंडवेतले मयकदेसेज़रादूरउसमोड़पर दोबदनप्‍यारकीआगमेंजलगए
प्‍यारहर्फे़वफ़ा[1]... प्यारउनकाखु़दा प्‍यारउनकीचिता।।
दोबदनप्‍यारकीआगमेंजलगए।।
ओसमेंभीगते, चाँदनीमेंनहातेहुए जैसेदोताज़ारू[2]ताज़ादमफूल[3]

आपकी याद आती रही रात भर

- फ़ैज़अहमदफ़ैज़

मख़दूम[1]कीयादमें-1
"आपकीयादआतीरहीरात-भर" चाँदनीदिलदुखातीरहीरात-भर
गाहजलतीहुई, गाहबुझतीहुई शम-ए-ग़मझिलमिलातीरहीरात-भर
कोईख़ुशबूबदलतीरहीपैरहन[2] कोईतस्वीरगातीरहीरात-भर
फिरसबा

गणतंत्र की क्रांति

गणतंत्रदिवसकीआपसबकोढेरोंबधाई! भाईअभयकीदोरचनायेंइसगणतंत्रकेजनोंकोसप्रेमभेंटकीजारहीहैं। hum sab kabeer hain: गणतंत्रकीक्रांति
तस्वीरयेबदलनीहैआवाज़करो. हुंकारहै, देशअबआज़ादकरो.
मालिकहैंमुख़्तारहैं फिरभीक्योंलाचारहैं?

अभिव्यक्ति

कुछ साहित्य के सुधी जन साहित्य की बिखरी कड़ियों को पिरोने का प्रयास कर रहे हैं। उनके प्रयासों के कुछ उदाहरण के रूप में ये तीन लिंक यहां दिए जा रहे हैं।
इन्हें देखें और अपने सुझाव दें।


1- अभिव्यक्ति : सुरुचि की - भारतीय साहित्य, संस्कृति, कला और दर्शन पर आधारित।


2- अगर कोई विचार मन में कौंध रहा है, तो कलम उठाइए


3- छुट्टी की अर्जी:
     केवल एक कागज या दस्तावेज ही नहीं....
     एक भावना है..
     एक आशा है उम्मीद है...
     और हक भी है एक धमकी है..
     बहाना है....


धरोहर: अर्जी छुट्टी की..........संतोष सुपेकर

छुट्टी की अर्जी:
केवल एक कागज या दस्तावेज ही नहीं....
एक भावना है..
एक आशा है उम्मीद है...
और हक भी है एक धमकी है..
बहाना है....

गाँवों का खोखला उत्थान

विश्वपटल पर हमारे देश की पहचान एक कृषि प्रधान देश के रूप मे है. गाँवों को भारत के पैर कहा जाता है. हम गाँवों के बहुआयामी उत्थान के लिए अग्रसर भी हैं चाहे वह सड़कों, नहरों, शिक्षा, स्वास्थ्य कोई भी क्षेत्र हो। प्रगति के आंकड़े वन्दनीय ऊंचाईयों को छू रहै हैं, लेकिन कई बार गाँव के दावे पर आंकड़े खोखले सिद्ध हो जाते हैं. वैश्विक फलक पर देश के पैरों का ढिंढोरा तो खूब पिटता है परन्तु पैरों का लकवा आर पोलियो किसी के संज्ञान मे नही है, परिणाम लड़खड़ाती गति हमारे समक्ष है. वस्तुत: विकास की बयार का रुख ही कुछ ऐसा है कि हम ग्रामीण भी अपनी उन्नति का मानक मोबाइल, वाह्य व्यक्तित्व/साज-सज्जा और विलासिता मानने लगे हैं. भूलते जा रहे हैं कि आर्थिकी रीढ़ तो कृषि है, उद्यम ही सर्वसाधन है. गाँवों का शहरीकरण ज्स गति से हो रहा है उससे कही तीव्र गति से मानसिकता बदल रही है वो भी पश्चिमी तर्ज पर. विकास की धुरी कहीं भी घूमती हो पर विश्व का मूल आधार प्राथमिक उत्पादों पर हा टिका है. जिनके लिए हमे कृषि/प्रकृति और उद्यम का सहारा लेना ही पड़ेगा. परन्तु कृषि के साथ उद्यम करना परम्पराओं का अनुसरण करना तो वर्तमा…

रचनाकार: गरिमा जोशी पंत की कविता - तू और मैं

रचनाकार: गरिमा जोशी पंत की कविता - तू और मैं

हम लाख छुपाएं
पारखी समझ गए
हममें हव्वा कौन 
मैं या तू
हममें आदम कौन
तू या मैं।

आगे पढ़ें: रचनाकार: गरिमा जोशी पंत की कविता - तू और मैंhttp://www.rachanakar.org/2013/01/blog-post_3469.html#ixzz2IWcOz900