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कहानी - शम्भू रैदास

- डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव
(यह कहानी उस समय की है जब गाँवों में मजदूर को एक दिन की मजदूरी आठ आने मिलती थी। साइकिल रखना स्टेटस सिम्बल माना जाता था और गाँव के धनी-मानी व्यक्तियों के पास ही निज की बैलगाड़ी होती थी।)     शम्भू रैदास रायबरेली जनपद के मलिकपुर बरना उर्फ बन्ना ग्राम में ‘चौधरी’ के उपनाम से प्रसिद्ध था। जवाँर के लोग उसका बड़ा सम्मान करते थे। बन्ना के जमींदारान कायस्थ घराने में उसकी पुश्तैनी हलवाही थी। शम्भू भी उसी परम्परा में लाला सूरज नारायन की सीर का सारा कार्य-भार संभालता था। सूरज नारायन विधुर थे। उनकी पत्नी शारदा देवी बड़ी ही धर्म-परायण और साध्वी महिला थीं। कुछ वर्षों पूर्व एक लम्बी बीमारी के बाद उनका देहावसान हुआ था। उनकी सज्जनता की कहानियाँ प्रायः गाँव में लोगों की जुबान से सुनाई पड़ती थी। सूरज नारायन एक सरकारी मुलाजिम थे और इस सिलसिले में उन्हें अधिकांशतः गाँव से सुदूर जनपदों में अपने कार्यक्षेत्र में रहना पड़ता था। उनका बड़ा पुत्र श्याम इलाहाबाद में बी.काम. की पढाई कर रहा था और वहीं एक हॉस्टल में रहता था। सूरज नारायन के छोटे पुत्र का नाम बृजेन्द्र था। वह दसवीं कक्षा का छात्र…

व्यंग्य - अभिभूत

-डॉ अनिल मिश्र
सुभान अल्लाह! क्या हनक, क्या शोखी, क्या तेजी! सारे रसों, सारे अलंकारों को अपने में समाहित किए इस काव्यदेवी का स्थायी भाव ईमानदारी ही माना था, समालोचकों ने। ज़बान कभी शीरी तो कभी मिर्ची। बात का लहजा और कथ्य क्या कहने, कहीं कोमल कान्त पदावली, कहीं ग़ज़ल की नाज़ुकी, कहीं श्रृंगार की मिठास, कहीं कसीदों की कारीगरी तो कहीं वीर रस की नितांत गर्म तासीर। नई वाली मैडम के इस सर्वांगपूर्ण व्यक्तित्व ने सभी को सम्मोहित कर रखा था। अधीनस्थ तो अधीनस्थ, बड़े सा’ब से लेकर बूढ़े वाले मंत्री जी तक सभी इस चुम्बकीय आकर्षण के परिधिगत थे। जिस कार्य को जब, जैसे, जहाँ चाहा, किया। जिस कार्य के लिए उन्होंने हाँ कहा, हाँ तथा जिसे ना कह दिया, ऊपर तक ‘ना’ ही हो गया। अपने काम से काम रखने वाले, दुनियादारी में कच्चे, पर मूल्यों के पक्के, विभागीय खेमेबाजी से अलग प्रशांत खेमका जी, जो जल्दी किसी से प्रभावित नहीं होते थे, मैडम जी से इतने अभिभूत हुए कि उनके दिल की गहराई मैडम जी के व्यक्तित्व एवं कार्यशैली की पहाड़ जैसी ऊँचाई से पट गई। जहाँ जाते, जिससे मिलते, मैडम जी का गुणगान उसी तरह करते जिस तरह नारद जी भगवान् का। …

नवीन मणि त्रिपाठी के मुक्तक

नारी संवेदना
लिपटकफ़नमें आबरू को खोगयी बेटी। बापके कन्धोंपेअर्थीमें सो गयी बेटी।। ये तख्तो-ताज व ताकत बहुत निकम्मी है। अलविदा कहतेरे कानून कोगयीबेटी।।

हमशहादतकेनामपरहिसाबमाँगेंगे। इसहुकूमत से तो वाजिबजबाबमाँगेंगे।। चिताएँ खूबसजा दी हैं आजअबलाकी। हरहिमाकतपेतुझ सेइन्कलाबमाँगेंगे।।

पंखतितलीका कुतर कर गए बयानतेरे। तालिबानीकीशक्ल में हुएफरमानतेरे।। कुर्सियाँ पाके हुएतुम भीबदगुमानबहुत। अस्मतेंसारीलूटलेगए दरबानतेरे।।

लाशझूलीजोदरख्तोंपेशर्मसारहुए। जुर्म<