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नवीन मणि त्रिपाठी के मुक्तक

नारी संवेदना
लिपटकफ़नमें आबरू को खोगयी बेटी। बापके कन्धोंपेअर्थीमें सो गयी बेटी।। ये तख्तो-ताज व ताकत बहुत निकम्मी है। अलविदा कहतेरे कानून कोगयीबेटी।।

हमशहादतकेनामपरहिसाबमाँगेंगे। इसहुकूमत से तो वाजिबजबाबमाँगेंगे।। चिताएँ खूबसजा दी हैं आजअबलाकी। हरहिमाकतपेतुझ सेइन्कलाबमाँगेंगे।।

पंखतितलीका कुतर कर गए बयानतेरे। तालिबानीकीशक्ल में हुएफरमानतेरे।। कुर्सियाँ पाके हुएतुम भीबदगुमानबहुत। अस्मतेंसारीलूटलेगए दरबानतेरे।।

लाशझूलीजोदरख्तोंपेशर्मसारहुए। जुर्म<

आधी रात में / पाश

आधी रात में मेरी कँपकँपी सात रजाइयों में भी न रुकी सतलुज मेरे बिस्तर पर उतर आया सातों रजाइयाँ गीली बुखार एक सौ छह, एक सौ सात हर साँस पसीना-पसीना युग को पलटने में लगे लोग बुख़ार से नहीं मरते मृत्यु के कन्धों पर जानेवालों के लिए मृत्यु के बाद ज़िन्दगी का सफ़र शुरू होता है मेरे लिए जिस सूर्य की धूप वर्जित है मैं उसकी छाया से भी इनकार कर दूँगा मैं हर खाली सुराही तोड़ दूँगा मेरा ख़ून और पसीना मिट्टी में मिल गया है
मैं मिट्टी में दब जाने पर भी उग आऊँगा

इस गली के आख़िरी में मेरा घर टूटा हुआ

प्रमोद बेड़िया 
इस गली के आख़िरी में एक घर टूटा हुआ जैसे बच्चे का खिलौना हो कोई टूटा हुआ ।
उसने मुझको कल कहा था आप आकर देखिए  रहे सलामत आपका घर मेरा घर टूटा हुआ ।
आप उसको देख कर साबित नहीं रह पाएँगे , रोता कलपता सर पटकता मेरा घर टूटा हुआ ।
ज़िंदगी भर जो कमाई की वो सारी गिर गई कल के तूफ़ाँ में बचा है मेरा घर टूटा हुआ।
आपके स्नानघर के बराबर ही सही  अब तो वह भी ना बचा है मेरा घर टूटा हुआ।
नौ जने हम सारे रहते थे उसीमें यों जनाब ज्यों कबूतर पींजड़े में मेरा घर टूटा हुआ ।
आप कम से कम यही कि देखते वो मेरा घर इस गली के आख़िरी में मेरा घर टूटा हुआ ।

ग़ज़ल में मात्राओं की गणना:

संदीप द्विवेदी (वाहिद काशीवासी)
आज के समय में हमारे देश में काव्य की अनेक विधाएँ प्रचलित हैं जो हमें साहित्य के रस से सिक्त कर आनंदित करती हैं। इनमें कुछ इसी देश की उपज हैं तो कुछ परदेश से भी आई हैं और यहाँ आकर यहाँ के रंग-ढंग में ढल गई हैं। ऐसी ही एक अत्यंत लोकप्रिय काव्य विधा है ग़ज़ल। हमारे समूह में ग़ज़ल की मात्राओं की गणना पर चर्चा करने के लिए मुझे आमंत्रित किया गया है अतः मैं बिना किसी लाग-लपेट के अपनी बात आरंभ करता हूँ।
ग़ज़लें कहने के लिए कुछ निश्चित लयों अथवा धुनों का प्रयोग किया जाता है जिन्हें 'बह्र' के नाम से जाना जाता है। अगर आपका लिखा या कहा हुआ काव्य बह्र में बद्ध नहीं है तो उसे ग़ज़ल नहीं माना जा सकता। बह्र में ग़ज़ल कहने के लिए हमें मात्राओं की गणना का ज्ञान होना आवश्यक है जिसे 'तक़्तीअ' कहा जाता है। अगर हम तक़्तीअ करना सीख लेते हैं तो फिर बह्र भी धीरे-धीरे सध जाती है। हिंदी छंदों के विपरीत, जहाँ वर्णिक छंदों (ग़ज़ल भी वर्णिक छंद ही है) गणों के निश्चित क्रम निर्धारित होते हैं और हर मात्रा का अपने स्थान पर होना अनिवार्य होता है, ग़ज़ल की बह्र में मात्राओं की गणना में छूट…

भाषाओं का वैश्विक परिदृश्य और हिन्दी

- डा0 गोपाल नारायन श्रीवास्तव
जब हम भाषा के वैश्विक परिदृश्य की बात करते हैं तो सबसे पहले हमें भाषा विशेष की क्षमताओं के बारे में आश्वस्त होना पड़ता हैI वैश्विक धरातल पर कोई भी भाषा यूँ ही अनायास उभर कर अपना वर्चस्व नहीं बना सकतीI इसके पीछे भाषा की सनातनता का भी महत्वपूर्ण हाथ हैI स्वतंत्र भारत में जब पह्ला लोक-सभा निर्वाचन हुआ था उस समय हिन्दी भाषा विश्व में पाँचवे पायदान पर थीI आज उसे प्रथम स्थान का दावेदार माना जा रहा हैI अन्य बातें जिनकी चर्चा अभी आगे करेंगे उन्हें यदि छोड़  भी दें तो भाषा की वैश्विकता के दो प्रमुख आधार हैंI प्रथम यह कि आलोच्य भाषा कितने बड़े भू-भाग में बोली जा रही है और उस पर कितना साहित्य रचा जा रहा हैI दूसरी अहम् बात यह है कि वह भाषा कितने लोगों द्वारा व्यवहृत हो रही हैI इस पर विचार करने से पूर्व किसी भाषा का वैश्विक परिदृश्य क्या होना चाहिए और एतदर्थ किसी भाषा विशेष से क्या-क्या अपेक्षाएँ हैं, इस पर चर्चा होना प्रासंगिक एवं समीचीन हैI
      विश्व स्तर पर किसी भाषा के प्रख्यापित होने के लिए यह नितांत आवश्यक है कि उसका एक विशाल और प्रबुद्ध काव्य-शास्त्र हो,उसमें लेख…