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कुंती मुखर्जी

कुंती मुखर्जी - संक्षिप्त परिचय
       कवयित्री एवं लेखिका कुंती मुखर्जी का जन्म 04 जनवरी 1956 को मॉरीशस द्वीप के फ़्लाक़ ज़िला स्थित ब्रिज़ी वेज़िएर नामक गाँव में हुआ था. फ़्रेंच भाषा के माध्यम से प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने हिंदी की पढ़ाई की. वर्ष 1972 में मॉरीशस हिंदी प्रचारिणी सभा द्वारा संचालित प्रयाग हिंदी साहित्य सम्मेलन की विशारद मध्यमा तथा 1973 में साहित्य रत्न उत्तमा परीक्षाएँ उत्तीर्ण की. उन्नीसवीं सदी के मध्य में अंग्रेज़ों द्वारा भारत से विस्थापित एक सम्पन्न परिवार की पाँचवी पीढ़ी की होनहार सदस्या के रूप में आपको भारतीय संस्कार विरासत में मिला. धार्मिक,देशभक्त व विद्वान पिता के संरक्षण और मार्गदर्शन में साहित्य जगत से परिचय हुआ. छह वर्ष की छोटी उम्र से ही आपकी लेखनी सक्रिय हो उठी थी. आपकी असंख्य रचनाओं में काव्य और कहानी ही मुख्य हैं. प्रकृति प्रेम से ओतप्रोत इन रचनाओं में नारी के  प्रति एक अतिसंवेदनशील रचनाकार के हृदय की छवि झलकती है.        विवाहोपरांत लेखिका वर्तमान में अधिकांश समय भारत में ही व्यतीत करती हैं. उनका काव्य-संग्रह “बंजारन” हाल ही में (2013) अंजुम…

मनोज शुक्ल का गीत

यूँ न शरमा के नज़रें झुकाओ प्रिये, मन मेरा बाबला है मचल जायेगा. तुम अगर यूँ ही फेरे रहोगी नज़र, वक़्त है वेवफा सच निकल जायेगा.
अब रुको थरथराने लगी जिंदगी, है दिवस थक गया शाम ढलने लगी. खड़खड़ाने लगे पात पीपल के हैं, ठंढी- ठंढी हवा जोर चलने लगी. बदलियाँ घिर गयीं हैं धुँधलका भी है, घन सघन आज निश्चित बरस जायेगा. तुम चले गर गए तन्हाँ हो जाउंगा, मन मिलन को तुम्हारे तरस जायेगा. तुम अगर पास मेरे रुकी रह गयीं, आज की रात ये दीप जल जायेगा. यूँ न शरमा.....................


मौन हैं सिलवटें चादरों की बहुत, रोकती-टोकती हैं दिवारें तुम्हें. झूमरे ताकतीं सोचतीं देहरियां, कैसे लें थाम कैसे पुकारें तुम्हें. रातरानी बहुत चाहती है तुम्हें, बेला मादक भी है रोकना चाहता, चंपा भी चाहता है तुम्हारी छुअन, बूढ़ा कचनार भी टोकना चाहता. गर्म श्वांसों का जो आसरा ना मिला, तो "मनुज " वर्फ सा आज गल जाएगा. यूँ न ...............


रुक ही जाओ अधर भी प्रकम्पित से हैं, ये नयन बेबसी से तुम्हें ताकते. वासना प्यार में आज घुलने लगी, ताप मेरे लहू का हैं क्षण नापते. मन है बेचैन तन भी है बेसुध बहुत,

नव वर्ष की शुभकामनायें!

सभी मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें!
- निर्झर टाइम्स टीम 

श्रीप्रकाश

संक्षिप्त परिचय- जन्म- 28 फरवरी 1959 शिक्षा- एम.ए. (हिंदी), कानपुर विश्वविधालय प्रकाशित कृतियाँ - सौरभ (काव्य संग्रह), उभरते स्वर, दस दिशाएं, सप्त स्वर इत्यादि काव्य संकलनों में तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतरजाल मंचों पर कवितायें/गीत/लेख आदि | सम्मान- निराला साहित्य परिषद् महमूदाबाद (सीतापुर), युवा रचनाकार मंच लखनऊ, अखिल भारत वैचारिक क्रांति मंच लखनऊ आदि संस्थाओं द्वारा सम्मानित | गतिविधियाँ- सचिव (साहित्य), निराला साहित्य परिषद् महमूदाबाद (उ.प्र.) एवं संस्थापक/निदेशक ‘ज्ञान भारती’ (लोक सेवी संस्थान) महमूदाबाद (उ.प्र.) | सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन ईमेल- sahitya_sadan@rediffmail.com

तीन मुक्तक - श्रीप्रकाश
विश्व को विश्व के चाह की यह लड़ी विश्व में चेतना प्राण जब तक रहे, प्रिय मधुप का कली पे बजे राग भी जब तलक गंध सौरभ सुमन में बहे ! *** प्यार छलता रहा प्रीति के पंथ पर दीप जलता रहा शाम ढलती रही, जिंदगी निशि प्रभा की मधुर आस ले रात दिन सी सरल साँस चलती रही ! *** नेह की गति नहीं है निरति अंक में काल की गति नहीं उम्र की गति नहीं, चाह की गति नहीं कल्प की गति नहीं रूप के पंथ पर तृप्ति की गति नहीं
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नूतन वर्ष मंगलमय हो !

वर्ष नया हो मंगलकारी, सुखी आपका हो जीवन दूर वेदनाएं हों सारी, रहे प्रफुल्लित हर पल मन !
मिले सफलता कदम-कदम पर, पूरी हों अभिलाषाएं कर्मयोग को साध्य बनाकर, अपना इच्छित फल पायें
बाहुपाश में जकड़ न पायें, असफलताओं के बंधन दूर वेदनाएं हों सारी, रहे प्रफुल्लित हर पल मन !
स्वार्थ, लोभ, आलस्य, क्रोध, कलुषित भावों से मुक्ति मिले जीवन के संघर्ष के लिए, अटल, असीमित शक्ति मिले !
मुक्त ईर्ष्या, द्वेष, घृणा से, हृदय आपका हो पावन दूर वेदनाएं हों सारी, रहे प्रफुल्लित हर पल मन !
मानवता की सेवा करना, निज जीवन का लक्ष्य बनायें अपना जीवन करें सार्थक, सारे जग में यश पायें !
मानवता पर हों न्योछावर, कर दें अपना तन,मन,धन दूर वेदनाएं हों सारी, रहे प्रफुल्लित हर पल मन !
नूतन वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं सहित- --राहुल देव-

पुस्तक समीक्षा : जीवन का स्वर मंद न हो (काव्य संग्रह)

डॉ परमलाल गुप्त हिंदी साहित्य के जानेमाने हस्ताक्षर हैं जोकि अनवरत रूप से अपनी सशक्त रचनाओं एवं कृतियों के माध्यम से हिंदी साहित्य जगत में अपनी एक अलग ही पहचान बनाये हुए हैं | इसी क्रम में आपका दशम कविता संग्रह ‘जीवन का स्वर मंद न हो’ भी है |

पूरा संग्रह मुझे एक विराट कविसम्मेलन की तरह लगता है जिसमें आने वाला श्रोता विविध प्रकार के कवियों से विविध प्रकार की कविताओं की अपेक्षा करता है | इस कविता संग्रह को पढ़ना एक नए अनुभव से गुजरने जैसा है | डॉ गुप्त ने तमाम सामयिक विषयों को समेटते हुए अपने पाठकों की चली आ रही समस्याओं को भी दूर कर दिया है |

पुस्तक की ज्यादातर रचनाएँ गीत विधा में हैं | कुछ मुक्तक, कवितायेँ और अंत में बच्चों के लिए आठ बाल कवितायेँ, यानी लगभग सभी के लिए कुछ न कुछ | कवि ने सरल काव्यात्मक भाषा का इस्तेमाल बड़ी खूबसूरती के साथ किया है | उनके तर्क पाठक को वैचारिक स्तर पे प्रभावित करते हैं | कवि की एक प्रमुख विशेषता उल्लेखनीय है वह यह है कि जो उसने देखा, जो भोगा उसे बड़े अच्छे तरीके से शब्दों में गूंथकर सच्चे मन से प्रस्तुत कर दिया है | उसे यह परवाह नहीं कि कोई क्या कहेगा | उसने …

पुस्तक समीक्षा : अंधे की आंख (उपन्यास)

श्री राजेन्द्र कुमार रस्तोगी कृत 517 पृष्ठीय वृहद् उपन्यास ‘अंधे की आँख’ इस वक़्त मेरे हाथ में है | नायक चंदर के जीवन पर केन्द्रित इस उपन्यास में लेखक की गहन अंतर्व्यथा उभर कर सामने आती है | यहाँ पर चंदर हमारे समाज के अत्यंत सीमित साधनों-संसाधनों के बीच जी रहे तमाम स्थितियों-परिस्थितियों से जूझते हुए एक आम आदमी का प्रतीक बन जाता है | चंदर की सारी समस्याएं हमसे व हमारे आसपास के सामाजिक वातावरण से जुड़ी हुई हैं | उपन्यास को पढ़ते हुए पाठक उससे जुड़ाव महसूस करता है | उपन्यास की पूरी कथावस्तु का प्रस्तुतिकरण प्रभावशाली है लेकिन कहीं कहीं पर घटनाओं को अनावश्यक लम्बाई दे दी गयी है जिससे बचा जा सकता था | उपन्यास इतना वृहद् है कि प्रथमतः मुझे खुद इसकी समीक्षा लिख पाना एक चुनौती लगा | हालांकि लेखक ने तमाम घटनाओं व जीवन-जगत की अत्यंत छोटी-छोटी सी लगने वाली बातों को भी अच्छे शब्द दिए हैं | उपन्यास चंदर के निराशाभरे वक्तव्य से शुरू होकर आशा रुपी उजाले के सुखद अंत की ओर बढ़ता है | इसी उपन्यास के कुछ अच्छे अंश दृष्टव्य हैं- ‘इतना कुछ होते-पाते त्रिभुवन व्यापिनी जैसी अंधियारी के चलते रुद्ध और असहज हो गयी थ…