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Showing posts from May, 2015

इस गली के आख़िरी में मेरा घर टूटा हुआ

प्रमोद बेड़िया 
इस गली के आख़िरी में एक घर टूटा हुआ जैसे बच्चे का खिलौना हो कोई टूटा हुआ ।
उसने मुझको कल कहा था आप आकर देखिए  रहे सलामत आपका घर मेरा घर टूटा हुआ ।
आप उसको देख कर साबित नहीं रह पाएँगे , रोता कलपता सर पटकता मेरा घर टूटा हुआ ।
ज़िंदगी भर जो कमाई की वो सारी गिर गई कल के तूफ़ाँ में बचा है मेरा घर टूटा हुआ।
आपके स्नानघर के बराबर ही सही  अब तो वह भी ना बचा है मेरा घर टूटा हुआ।
नौ जने हम सारे रहते थे उसीमें यों जनाब ज्यों कबूतर पींजड़े में मेरा घर टूटा हुआ ।
आप कम से कम यही कि देखते वो मेरा घर इस गली के आख़िरी में मेरा घर टूटा हुआ ।

ग़ज़ल में मात्राओं की गणना:

संदीप द्विवेदी (वाहिद काशीवासी)
आज के समय में हमारे देश में काव्य की अनेक विधाएँ प्रचलित हैं जो हमें साहित्य के रस से सिक्त कर आनंदित करती हैं। इनमें कुछ इसी देश की उपज हैं तो कुछ परदेश से भी आई हैं और यहाँ आकर यहाँ के रंग-ढंग में ढल गई हैं। ऐसी ही एक अत्यंत लोकप्रिय काव्य विधा है ग़ज़ल। हमारे समूह में ग़ज़ल की मात्राओं की गणना पर चर्चा करने के लिए मुझे आमंत्रित किया गया है अतः मैं बिना किसी लाग-लपेट के अपनी बात आरंभ करता हूँ।
ग़ज़लें कहने के लिए कुछ निश्चित लयों अथवा धुनों का प्रयोग किया जाता है जिन्हें 'बह्र' के नाम से जाना जाता है। अगर आपका लिखा या कहा हुआ काव्य बह्र में बद्ध नहीं है तो उसे ग़ज़ल नहीं माना जा सकता। बह्र में ग़ज़ल कहने के लिए हमें मात्राओं की गणना का ज्ञान होना आवश्यक है जिसे 'तक़्तीअ' कहा जाता है। अगर हम तक़्तीअ करना सीख लेते हैं तो फिर बह्र भी धीरे-धीरे सध जाती है। हिंदी छंदों के विपरीत, जहाँ वर्णिक छंदों (ग़ज़ल भी वर्णिक छंद ही है) गणों के निश्चित क्रम निर्धारित होते हैं और हर मात्रा का अपने स्थान पर होना अनिवार्य होता है, ग़ज़ल की बह्र में मात्राओं की गणना में छूट…