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अरुन शर्मा अनन्त की बात


समाज में असहज परिवर्तन मनुष्य के भीतर की समाप्त होती संवेदनाएँ, बड़प्पन और अनुजता के मधुर संबंधों में विच्छेद मनुजता के लिए अत्यंत हानिकारी होता जा रहा है. भावनाएँ दिन प्रतिदिन मलिन होती जा रही हैं, स्वयं को सर्वेसर्वा बनाने की जद्दोजहद में परस्पर प्रेम - व्यवहार का अंत हो रहा है. 

निंदनीय कार्यों में होती वृद्धि गिरी हुई मानसिकता के शिकार होते लोग, सभ्यता, संस्कृति, मान, मर्यादा को रौंद कर अपने मन की करने को आतुर आने वाली पीढ़ी अंधकारमय होती जा रही है. आने वाली पीढ़ी को दिशा देना समाज का धर्मं होता है किन्तु परिस्थिति अत्यंत दुःखद है समाज स्वयं दिशाहीन, समाज को उचित मार्ग दिखानेवाला साहित्य मठाधीशों एवं बहुत से फ़ालतू लोगों से भरा पड़ा है. 

मेरे अग्रज बृजेश नीरज जी कहते हैं " जिनके पास करने को कुछ नहीं होता, एकाध तुकबन्दी कर लेंगे, उसके बाद शुरू कर देंगे मठाधीशी. ऐसे लोग तमाम तरह के फसाद विभिन्न विषयों को लेकर करते रहते हैं. खुद को स्थापित करने और मान्यता दिलाने के उनके ये प्रयास सफल तो नहीं हो पाते, हाँ, कुछ मूढ़ व्यक्तियों के समर्थन से चर्चित जरूर हो जाते हैं. साहित्य अध्ययन और लगन दोनों चाहता है". यहाँ एक तथ्य उभर कर सामने आता है कि "साहित्य समय चाहता है, साहित्य - अध्ययन - चिंतन और लगन से प्राप्त होता है". "साहित्य एक साधना है" साहित्य की प्राप्ति सरल नहीं और इसकी प्राप्ति केवल एक साधक को ही होती है, साहित्य के प्रति सजग होने के साथ साथ गंभीरता अनिवार्य है. 

वर्तमान परिदृश्य में महिलायें साहित्य की ओर अग्रसर हुई हैं, नए रचनाकारों का जन्म हुआ है, इन रचनाकारों में अपार संभावनाएँ हैं जरुरत है तो सही दिशा में कार्य करने की. मनुष्य अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए सत्य पथ पर चले ईश्वर से इसी प्रार्थना के साथ अपनी बात को विराम देता हूँ.


अरुन शर्मा 'अनन्त'

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