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Showing posts from December, 2013

नूतन वर्ष मंगलमय हो !

वर्ष नया हो मंगलकारी, सुखी आपका हो जीवन दूर वेदनाएं हों सारी, रहे प्रफुल्लित हर पल मन !
मिले सफलता कदम-कदम पर, पूरी हों अभिलाषाएं कर्मयोग को साध्य बनाकर, अपना इच्छित फल पायें
बाहुपाश में जकड़ न पायें, असफलताओं के बंधन दूर वेदनाएं हों सारी, रहे प्रफुल्लित हर पल मन !
स्वार्थ, लोभ, आलस्य, क्रोध, कलुषित भावों से मुक्ति मिले जीवन के संघर्ष के लिए, अटल, असीमित शक्ति मिले !
मुक्त ईर्ष्या, द्वेष, घृणा से, हृदय आपका हो पावन दूर वेदनाएं हों सारी, रहे प्रफुल्लित हर पल मन !
मानवता की सेवा करना, निज जीवन का लक्ष्य बनायें अपना जीवन करें सार्थक, सारे जग में यश पायें !
मानवता पर हों न्योछावर, कर दें अपना तन,मन,धन दूर वेदनाएं हों सारी, रहे प्रफुल्लित हर पल मन !
नूतन वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं सहित- --राहुल देव-

पुस्तक समीक्षा : जीवन का स्वर मंद न हो (काव्य संग्रह)

डॉ परमलाल गुप्त हिंदी साहित्य के जानेमाने हस्ताक्षर हैं जोकि अनवरत रूप से अपनी सशक्त रचनाओं एवं कृतियों के माध्यम से हिंदी साहित्य जगत में अपनी एक अलग ही पहचान बनाये हुए हैं | इसी क्रम में आपका दशम कविता संग्रह ‘जीवन का स्वर मंद न हो’ भी है |

पूरा संग्रह मुझे एक विराट कविसम्मेलन की तरह लगता है जिसमें आने वाला श्रोता विविध प्रकार के कवियों से विविध प्रकार की कविताओं की अपेक्षा करता है | इस कविता संग्रह को पढ़ना एक नए अनुभव से गुजरने जैसा है | डॉ गुप्त ने तमाम सामयिक विषयों को समेटते हुए अपने पाठकों की चली आ रही समस्याओं को भी दूर कर दिया है |

पुस्तक की ज्यादातर रचनाएँ गीत विधा में हैं | कुछ मुक्तक, कवितायेँ और अंत में बच्चों के लिए आठ बाल कवितायेँ, यानी लगभग सभी के लिए कुछ न कुछ | कवि ने सरल काव्यात्मक भाषा का इस्तेमाल बड़ी खूबसूरती के साथ किया है | उनके तर्क पाठक को वैचारिक स्तर पे प्रभावित करते हैं | कवि की एक प्रमुख विशेषता उल्लेखनीय है वह यह है कि जो उसने देखा, जो भोगा उसे बड़े अच्छे तरीके से शब्दों में गूंथकर सच्चे मन से प्रस्तुत कर दिया है | उसे यह परवाह नहीं कि कोई क्या कहेगा | उसने …

पुस्तक समीक्षा : अंधे की आंख (उपन्यास)

श्री राजेन्द्र कुमार रस्तोगी कृत 517 पृष्ठीय वृहद् उपन्यास ‘अंधे की आँख’ इस वक़्त मेरे हाथ में है | नायक चंदर के जीवन पर केन्द्रित इस उपन्यास में लेखक की गहन अंतर्व्यथा उभर कर सामने आती है | यहाँ पर चंदर हमारे समाज के अत्यंत सीमित साधनों-संसाधनों के बीच जी रहे तमाम स्थितियों-परिस्थितियों से जूझते हुए एक आम आदमी का प्रतीक बन जाता है | चंदर की सारी समस्याएं हमसे व हमारे आसपास के सामाजिक वातावरण से जुड़ी हुई हैं | उपन्यास को पढ़ते हुए पाठक उससे जुड़ाव महसूस करता है | उपन्यास की पूरी कथावस्तु का प्रस्तुतिकरण प्रभावशाली है लेकिन कहीं कहीं पर घटनाओं को अनावश्यक लम्बाई दे दी गयी है जिससे बचा जा सकता था | उपन्यास इतना वृहद् है कि प्रथमतः मुझे खुद इसकी समीक्षा लिख पाना एक चुनौती लगा | हालांकि लेखक ने तमाम घटनाओं व जीवन-जगत की अत्यंत छोटी-छोटी सी लगने वाली बातों को भी अच्छे शब्द दिए हैं | उपन्यास चंदर के निराशाभरे वक्तव्य से शुरू होकर आशा रुपी उजाले के सुखद अंत की ओर बढ़ता है | इसी उपन्यास के कुछ अच्छे अंश दृष्टव्य हैं- ‘इतना कुछ होते-पाते त्रिभुवन व्यापिनी जैसी अंधियारी के चलते रुद्ध और असहज हो गयी थ…

चुनाव आने पर...

पूँजीवादी जन के नेता
जनता के हृदय सम्राट
दर्शन दुर्लभ हो गए
पधारे पाँच साल बाद आप
लोकतंत्र की चाट बिक गयी
सारे दोने साफ़ पड़े हैं
देर लगा दी आने में
अब तुम केवल चटनी को चाटो
फिर भीड़तन्त्र की रेल में
रेवडियाँ बाँटो !

- राहुल देव

कविता क्या है?

लेखक -- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
कविता से मनुष्य-भाव की रक्षा होती है। सृष्टि के पदार्थ या व्यापार-विशेष को कविता इस तरह व्यक्त करती है मानो वे पदार्थ या व्यापार-विशेष नेत्रों के सामने नाचने लगते हैं। वे मूर्तिमान दिखाई देने लगते हैं। उनकी उत्तमता या अनुत्तमता का विवेचन करने में बुद्धि से काम लेने की जरूरत नहीं पड़ती। कविता की प्रेरणा से मनोवेगों के प्रवाह जोर से बहने लगते हैं। तात्पर्य यह कि कविता मनोवेगों को उत्तेजित करने का एक उत्तम साधन है। यदि क्रोध, करूणा, दया, प्रेम आदि मनोभाव मनुष्य के अन्तःकरण से निकल जाएँ तो वह कुछ भी नहीं कर सकता। कविता हमारे मनोभावों को उच्छवासित करके हमारे जीवन में एक नया जीव डाल देती है। हम सृष्टि के सौन्दर्य को देखकर मोहित होने लगते हैं। कोई अनुचित या निष्ठुर काम हमें असह्य होने लगता है। हमें जान पड़ता है कि हमारा जीवन कई गुना अधिक होकर समस्त संसार में व्याप्त हो गया है।  कार्य में प्रवृत्ति कविता की प्रेरणा से कार्य में प्रवृत्ति बढ़ जाती है। केवल विवेचना के बल से हम किसी कार्य में बहुत कम प्रवृत्त होते हैं। केवल इस बात को जानकर ही हम किसी काम के करने या न…

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

जन्म:-15 सितंबर 1927 निधन:-24 सितंबर 1983 जन्म स्थान:- बस्ती, उत्तर प्रदेश प्रमुखकृतियाँ:- काठ की घंटियाँ, बांस का पुल, गर्म हवाएँ, एक सूनी नाव, कुआनो नदी कविता संग्रह ‘खूँटियों पर टँगे लोग’ के लिये 1983 का साहित्य अकादमी पुरस्कार

एक छोटी सी मुलाकात - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

कुछ देर और बैठो –
अभी तो रोशनी की सिलवटें हैं
हमारे बीच।

शब्दों के जलते कोयलों की आँच
अभी तो तेज़ होनी शुरु हुई है
उसकी दमक
आत्मा तक तराश देनेवाली
अपनी मुस्कान पर
मुझे देख लेने दो

मैं जानता हूँ
आँच और रोशनी से
किसी को रोका नहीं जा सकता
दीवारें खड़ी करनी होती हैं
ऐसी दीवार जो किसी का घर हो जाए।

कुछ देर और बैठो –
देखो पेड़ों की परछाइयाँ तक
अभी उनमें लय नहीं हुई हैं
और एक-एक पत्ती
अलग-अलग दीख रही है।

कुछ देर और बैठो –
अपनी मुस्कान की यह तेज़ धार
रगों को चीरती हुई
मेरी आत्मा तक पहुँच जाने दो
और उसकी एक ऐसी फाँक कर आने दो