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ISSN : 2349-7122

Sunday, 27 January 2013

इक चमेली के मंडवे तले

          - मख़दूम मोहिउद्दीन


इक चमेली के मंडवे तले 
मयकदे से ज़रा दूर उस मोड़ पर 
दो बदन प्‍यार की आग में जल गए 

प्‍यार हर्फे़ वफ़ा[1]... प्यार उनका खु़दा 
प्‍यार उनकी चिता ।। 

दो बदन प्‍यार की आग में जल गए ।। 

ओस में भीगते, चाँदनी में नहाते हुए 
जैसे दो ताज़ा रू[2] ताज़ा दम फूल[3] पिछले पहर 
ठंडी ठंडी सबक रौ[4] चमन की हवा 
सर्फे़ मातम[5] हुई 
काली काली लटों से लिपट गर्म रुख़सार[6] पर 
एक पल के लिए रुक गई । 

दो बदन प्‍यार की आग में जल गए ।। 

हमने देखा उन्‍हें 
दिन में और रात में 
नूरो-ज़ुल्‍मात में 
मस्जिदों के मीनारों ने देखा उन्‍हें 
मन्दिरों के किवाड़ों ने देखा उन्‍हें 
मयकदे की दरारों ने देखा उन्‍हें ।। 

दो बदन प्‍यार की आग में जल गए । 

अज़ अज़ल ता अबद[7] 
ये बता चारागर[8] 
तेरी ज़न्‍बील[9] में 

नुस्‍ख़-ए-कीमियाए मुहब्‍बत[10] भी है 
कुछ इलाज व मदावा-ए-उल्‍फ़त भी है। 
इक चम्‍बेली के मंडवे तले 
मयकदे से ज़रा दूर उस मोड़ पर 
दो बदन प्‍यार की आग में जल गए ।
शब्दार्थ:
1. ↑ वफ़ादारी की बात
2. ↑ आत्मा
3. ↑ ताज़ा खिले हुए फूल
4. ↑ मंद गति से चलने वाली
5. ↑ उदासी से घिर गई
6. ↑ गाल
7. ↑ दुनिया के पहले दिन से दुनिया के अंतिम दिन तक
8. ↑ वैद्य, हकीम
9. ↑ झोली
10.                ↑ प्रेम के उपचार का नुस्खा

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