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ISSN : 2349-7122

Monday, 28 January 2013

आस्था


यह यशोदा जी की पहली कविता है।

हे ईश्वर.....
सदियों से बने हुए हो
मूर्ति तुम....
 ...........
तुम्हें परोस कर
खिलाने का बहाना
अब त्याग दिया
    लोगों ने ....
अब
नोच-नोच कर
खाने लगे हैं तुम्हें ही 
तुम पर आस्थावान
लोगों को
     मोहरा बनाकर .....
         - यशोदा

4 comments:

  1. इससे अच्छी व्याख्या आज के धर्म और आस्था की नहीं हो सकती।

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    1. शुक्रिया बृजेश भाई
      वर्ड व्हेरिफिकेशन हटवा दें

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  2. आपने तो लिखा है ''मै किसी भी प्रकार की लेखिका नही हूं'' इस कविता मे मुझे एक उत्कृष्ट लेखिका के दर्शन हुए.

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  3. बहुत सुन्दर....
    बधाई यशोदा.

    शुभकामनाएं.
    अनु

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