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ISSN : 2349-7122

Thursday, 22 November 2012

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है



दिन जल्दी-जल्दी ढलता है 


- हरिवंशराय बच्चन


हो जाय पथ में रात कहीं,
मंज़िल भी तो है दूर नहीं -
यह सोच थका दिन का पंथी भी 
जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगे -
यह ध्यान परों में चिड़ियों के 
भरता कितनी चंचलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल? -
यह प्रश्न शिथिल करता पद को
भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!


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