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ISSN : 2349-7122

Tuesday, 20 November 2012

नीरज


मुक्तक



- नीरज 

अब वो दर्द, वो दिल, वो दीवाने हैं
अब वो साज, वो सोज, वो गाने हैं
साकी! अब भी यहां तू किसके लिए बैठा है
अब वो जाम, वो मय, वो पैमाने हैं
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इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में
तुमको लग जाएंगी सदियां इसे भुलाने में
तो पीने का सलीका, पिलाने का शऊर
अब तो ऐसे लोग चले आते हैं मैखान

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