ISSN

ISSN : 2349-7122

Saturday, 27 October 2012

Poem


ग़ज़ल





गुजरे हुए कल का अन्दाज ढूंढती हूं।
इंसान मे इंसानियत के राज ढूंढती हूं।।
मंजिल मिल जाएगी ये यकीं है मुझको,
जिंदगी बन जाएगी ये यकीं है मुझको।
बहती हुई नदी हूं, इक सार ढूंढती हूं,
इंसान मे...
आसां नही करना, कहना जो मुमकिन,
भूलेंगे ना अब जिन्दगी के ये दिन।
कहीं डूब ही जाउं पतवार ढूंढती हूं,
इंसान मे...
इंसान मे छिपे इंसानियत के दुश्मन,
बाहर से देवता हैं शैतान सब अन्दर।
दिल मे देखो सबके, बिखरे हैं मंजर,
उजड़े चमन मे गुलबाग ढूंढती हू।
इंसान मे,..''

-
मृदुल भारद्वाज
 
टड़ियावाँ,
हरदोई


No comments:

Post a Comment

साहित्यिक जगत में शिवना सम्मानों की गूँज: लीलाधर मंडलोई को 'अंतर्राष्ट्रीय शिवना सम्मान'

  - मुकेश नेमा और स्मृति आदित्य को कृति सम्मान सीहोर। नए वर्ष की ऊर्जा और साहित्यिक उल्लास के बीच 'शिवना प्रकाशन' द्वारा वर्ष 2025 क...