ISSN

ISSN : 2349-7122

Sunday, 28 October 2012

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना



जंगल की याद मुझे मत दिलाओ 




                   -सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

कुछ धुआँ
कुछ लपटें
कुछ कोयले
कुछ राख छोड़ता
चूल्हे में लकड़ी की तरह मैं जल रहा हूँ,
मुझे जंगल की याद मत दिलाओ!

हरेभरे जंगल की
जिसमें मैं सम्पूर्ण खड़ा था
चिड़ियाँ मुझ पर बैठ चहचहाती थीं
धामिन मुझ से लिपटी रहती थी
और गुलदार उछलकर मुझ पर बैठ जाता था.
जँगल की याद
अब उन कुल्हाड़ियों की याद रह गयी है
जो मुझ पर चली थीं
उन आरों की जिन्होंने
मेरे टुकड़ेटुकड़े किये थे
मेरी सम्पूर्णता मुझसे छीन ली थी !
चूल्हे में
लकड़ी की तरह अब मैं जल रहा हूँ
बिना यह जाने कि जो हाँडी चढ़ी है
उसकी खुदबुद झूठी है
या उससे किसी का पेट भरेगा
आत्मा तृप्त होगी,
बिना यह जाने
कि जो चेहरे मेरे सामने हैं
वे मेरी आँच से
तमतमा रहे हैं
या गुस्से से,
वे मुझे उठा कर् चल पड़ेंगे
या मुझ पर पानी डाल सो जायेंगे.
मुझे जंगल की याद मत दिलाओ!
एकएक चिनगारी
झरती पत्तियाँ हैं
जिनसे अब भी मैं चूम लेना चाहता हूँ
इस धरती को
जिसमें मेरी जड़ें थीं
!


No comments:

Post a Comment

साहित्यिक जगत में शिवना सम्मानों की गूँज: लीलाधर मंडलोई को 'अंतर्राष्ट्रीय शिवना सम्मान'

  - मुकेश नेमा और स्मृति आदित्य को कृति सम्मान सीहोर। नए वर्ष की ऊर्जा और साहित्यिक उल्लास के बीच 'शिवना प्रकाशन' द्वारा वर्ष 2025 क...