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ISSN : 2349-7122

Thursday, 11 December 2014

एक सवाल

अँधेरों में जब लिपटी थी रूह मेरी
तुम आए एक रौशनी बनकर

थी चारों तरफ स्याही निराशा की
तुम आए थे उम्मीद बनकर

अमावस की रात मैं थी बनी हुई
तुम आए तब पूर्णिमा का चाँद बनकर

सुलझाने लग गयी मैं जब पहेलियाँ
सवाल बना दिया तुमने परिचय मुझसे तेरा

करने लगी थी मैं मुस्कुराने की कोशिश
तुम चले गए क्यों रूठे हुए, अजनबी बनकर
- मंजु शर्मा 

अपनों का साथ और सरकार के संबल से संवरते वरिष्ठ नागरिक

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