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ISSN : 2349-7122

Sunday, 4 November 2012

सुरेन्द्र काले



चिट्ठी सी शाम




                       - सुरेन्द्र काले


एक और चिट्ठी सी शाम
डूब गयी सूरज के नाम।

जाड़े की धूप और
कुहरे की भाषा

कोने में टँगी हुई
गहरी अभिलाषा

आसमान के हाथों
चाँदी का गुच्छा

ताल में खिली जैसे
फिर कोई इच्छा

छत से ऊपर उठते
धुएँ के कलाम



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