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ISSN : 2349-7122

Friday, 26 October 2012

शक्ति का सशक्तिकरण


                                                         
                                             ''शक्ति का सशक्तिकरण''

 
महिला शब्द सुनते ही ज़हन मे प्रेमत्यागशक्ति और ममत्व की प्रतिमूर्ति उभर आती है.मां, बहनपत्नी आदि सभी रिश्तों में और समाज को पिताभाईपुत्रमित्र प्रदाता एक महिला ही तो हैबिना उसके सृष्टि की कल्पना तक सर्वदा असम्भव है. हमारे शास्रों ने पुरुष प्रधान समाज मे भी नारी को सर्वोच्च स्थान प्रदान कर उसे पूजनीय स्थान दिया है. आज की स्थिति देखें तो नारी स्तर गिरता ही जा रहा है. कन्याभ्रूण हत्यामहिला उत्पीड़नशोषणछेड़छाड़, बलात्कार आदि खबरें दैनिक दिनचर्या में शामिल हो गईं हैं. कैसा विडम्बना है कि एक तरफ भारत ही नही संपूर्ण विश्व मे महिला विकासशिक्षासशक्तिकरण की गूंज सुनाई पड़ रही है वहीं दूसरी तरफ महिला की अस्मिता और अस्तित्व पर काले बादल मंडरा रहे हैं. गृह मन्त्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश मे प्रति मिनट 166 महिलाएं छेड़छाड़ की शिकार होती हैं और 99 मिनट में एक दुष्कर्म होता है. एक अन्य अनुमान में संकेत करते हुए कहा गया है 77 मिनट मे एक दहेज मृत्यु, 23 मि. में एक अपहरण और प्रत्येक मि. मे एक महिला हिंसा का शिकार होती है. तमाम कानूनी प्राविधानों के बावजूद प्रत्येक वर्ष देश में अनेक नाबालिग बच्चियां अक्षय तीज पर परिणय-सूत्र में बंध जाती हैं. कम उम्र मे ही दायितवों के बोझ तले दबकर अपनी शिक्षामानसिक और शारीरिक विकास खो बैठतीं हैं. महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा दुर्भाग्यवश हर समाज की एक सच्चाई है लेकिन भारत में जिस तरह से इसे आमतौर पर समाज की स्वीकृति है वो समझ से परे है. महिला की चुप्पी तो समझ मे आती है क्योंकि ऐसे जघन्य कृत्य का शिकार होने के बाद महिला का जीवन ही अभिशाप बन जाता हैसमाज मे उसे घृणित दृष्टि से देखा जाता है कुछ तो विक्षिप्त होकर अपने जीवन की ही आहुती दे देती हैं. कई बार इसी तरह की विभिन्न विषमताएं पाटने के लिए मौन हो जाती हैं लेकिन परिवार के लोगपड़ोसासहकर्मी या फिर राह चलते लोग कैसे आंखें बन्द कर लेते हैं?
महिला सशक्तिकरण महिला की अस्मिता अस्तित्व और अधिकार का आंदोलन है. यह किसी भी समाज या देश की उन्नति का आधार है. मातृत्व के आंगन मे ही सभी का विकास होता है. किसी भी परिवार समाज या देश की तरक्की का अंदाजा लगाना हो तो पहचान की जा सकती है कि उस समाज में स्त्रियां कितनी स्वाधीन और आत्म निर्णायक की भूमिका में हैं.
अतीत से जो शक्तिस्वरूपा उद्घोषित होती रही होजिसकी ममता मे दुनिया नतमस्तक होती रही होउसके सशक्तिकरण की बात कुछ उपहासपूर्ण नही प्रतीत होती? जो जन्मत: पूज्या है, जिसे सर्वोच्च स्थान जन्म प्रदत्त है, उसे पुरुषों के बराबर हक़ दिये जाने की बात हो रही है यह कैसा 'सशक्तिकरण'! हम कैसे पहुंचे इस सशक्तिकरण तक, कौन है इसका जिम्मेदार नारी या पुरुष? आपके हृदय को ये प्रश्न नही कचोटते? जरूर कचोटते होंगेहो सकता है जिन्दगी के जद्दोजहद मे विस्मृत हो जाते हों. यहां बात महिला पुरुष की प्रतिस्पर्धा की नही है दोनो को मिलकर समस्या से निजात पाने की है. दोनो ही एक -दूसरे के पूरक हैंमेरा मानना है महिला को सशक्तिकरण तक पहुंचाने मे दोनो ही बराबर के भागीदीर हैं.
जब हम अतीत की नारी स्थिति पर विचार कर रहे हैं तो शास्त्रोक्ति पर प्रकाश डालना भी प्रासंगिक होगा. वेदों में नारी को इंगित करते हुए कहा गया है-
            '' कार्येषु दासी,करणेषु दासी,भोज्येसुमाता।
        शयनेसुरम्भा,धर्मानुकूला,क्षमया धरित्री।।''
आज की महिला का मन्तव्य मात्र 'कार्येषुमन्त्री' और 'भोज्येसुमाता' तक ही सीमित होता जा रहा है. 'धर्मानुकूला' को आधुनिकता ने 'क्षमयाधरित्री' को महिला आयोग निगल रहा है. पुरुषों का अगर बात करें तो बह सब भुला 'शयनेसुरम्भा' और 'करणेषु दासी' तक ही सीमित करने के अधिकारिक प्रयत्न मे लगे हुए हैंबस इसी द्वन्द के चलते हम इस विषम मोड़ पर  खड़े हुए हैं. मां अर्थात मिहिला की तुलना धरित्री से की गई है. उसका अस्तित्व और प्रतिष्ठा आपके हांथ हैमल त्याग किसी स्थान विशेष को दूषित भी कर सकते हैं और उसा स्थान पर सुकर्म कर पावन तपोस्थली भी बना सकते हैं.
यदि महिला वर्ग के हृदय तक पहुंचे मे सक्षम हो पा रही हूं तो यह अपील जरूर करना चाहूंगी कि समाज की बागडोर आपके हाथ हैसमाज की नींव को मजबूती प्रदान करेंअपनी संततिपुत्रभाई को ऐसे संस्कारित करे कि हर व्यक्ति का यथोचित सम्मान और आदर के लिए स्वप्रेरित हों. महिलाओ की अस्मिता की रक्षा का बींड़ा उठाएं जघन्य अपराधों के खिलाफ आवाज उठाने की निडरता हो उनमें. जब अकल्पित को यथार्थ कर दिखाया हम महिलाओं नेयह तो पुरातन से हमारे भारत मे होता आया है. आओ हम मिलकर एक अडिग मुहिम ठानें. बाकी पुरुष वर्ग से हम अबला क्या कहें।
           गर बदलनी है समाज की तस्वीर
          स्त्रियों समझो संस्कृति को संकीर्ण
                                                                                                     
                                        -Vandana Tiwari
                                          Sakhin, Hardoi
                   

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