ISSN

ISSN : 2349-7122

Tuesday, 21 October 2025

खुरदुरे यथार्थ को बयां करतीं कहानियाँ

    हमारे समाज में कहानी का इतिहास मानव सभ्यता के इतिहास जितना ही पुराना है। प्राचीन काल से ही कहानी-किस्से मानव समाज के किसी न किसी रूप में अनिवार्य हिस्से रहे हैं। हम राजा-रानियों की कहानी से लेकर परीकथाओं, साहस-शौर्य गाथाओं, धर्म-नीति और सत्य-कथाओं, सहित कहानी के विविध रूपों के साक्षी रहे हैं। समय, देश-काल और परिस्थितियों के अनुसार कहानी के स्वरूप में भी परिवर्तन हुए हैं। आज लिखी जा रही कहानियों में अपने समय का प्रतिबिंब है, वे आपको केवल मनोरंजन और शिक्षा देने के उद्देश्य से नहीं लिखी जातीं बल्कि आपके आस-पास के खुरदुरे यथार्थ, अपने समय के साथ उपजी विकृतियों, विषमताओं, विद्रूपताओं से आपका परिचय करवाती हैं, जिन्हें पढ़कर आप चिन्तन को विवश हो जाते हैं कि समाज में क्या होना चाहिए और क्या हो रहा है, इस प्रकार कहानीकार अपने उद्देश्य में सफल हो जाता है।

    सुपरिचित रचनाकार अरुण अर्णव खरे साहित्य की लगभग सभी विधाओं में सृजनरत हैं और हाल ही में उनका कहानी सँग्रह 'भास्कर राव इंजीनियर' प्रकाशित होकर पाठकों के सम्मुख आया है। उनके इस कहानी संग्रह में विविध विषयी 14 कहानियाँ संग्रहीत हैं। इन कहानियों से गुजरते वक्त पाठकों को लगेगा कि वह ऐसी घटनाओं, कहानियों अथवा पात्रों को कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में अपने समाज, अपने आस-पास देख चुका है। अरुण जी की यह कहानियाँ निश्चित ही उनके जीवनानुभव से उपजी हैं इसलिए पाठक को इनमें गहरे यथार्थ-बोध का अनुभव होता है। इन कहानियों में उनके पेशे इंजीनियरिंग का भी प्रभाव, यानी इंजीनियरिंग की पढ़ाई, कोचिंग, एंट्रेंस एग्जाम, दफ्तर की कार्य-प्रणाली आदि सहज रूप से कहानी का हिस्सा बनते हैं। उनकी कहानियाँ आज के समाज की तमाम चिन्ताओं को प्रकट करते हुए, पाठक की सम्वेदना को झकझोरने का महत्वपूर्ण कार्य करती हैं। वरिष्ठ साहित्यकार भालचंद्र जोशी ने अपनी भूमिका में लिखा भी है- "अरुण अर्णव खरे की इन कहानियों को पढ़ते हुए भाषा की संवेदन-ऊष्मा और भावनात्मक विश्वसनीयता के लिए श्रम करते एक जिम्मेदार लेखक के सामाजिक सरोकार भी स्पष्ट होते हैं।"

    संग्रह की प्रथम कहानी 'दूसरा राज महर्षि' आज के उस कटु यथार्थ से हमारा परिचय करवाती है, जिसमें माँ-बाप अपने बच्चों पर अपनी महत्वाकांक्षाओं का बोझ डाल देते हैं और जीवन में प्रतियोगिता, प्रतिस्पर्धा, सफलता के लिए बच्चों पर भारी दबाव डालते हैं, जिसके कारण बच्चे डिप्रेशन सहित कई समस्याओं का शिकार होकर कहीं के नहीं रहते। 'भास्कर राव इंजीनियर' सँग्रह की शीर्षक कहानी है। इंजीनियरिंग की वर्षों तक परीक्षा पास न करने वाला भास्कर राव एक भला व्यक्ति दूसरों की सदैव मदद करने वाला, अपने गाँव में बिजली की चिन्ता करने वाला, जुनून का पक्का, अंततः इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल कर लेता है, कहानी पाठक के ह्रदय को छू जाती है। 'देवता' कहानी आदमी के दोगलेपन को उजागर करती महत्वपूर्ण कहानी है। अच्छे-खासे होनहार लड़के सूरज को साहब निरंजन उनके विभाग में बाबू की नौकरी लगवा देते हैं, उनका खुद का बेटा पढ़ने में फिसड्डी है, फिर भी उसे डोनेशन देकर इंजीनियरिंग करवाते है, पत्नी एवम बेटी के विरोध करने पर उनका यह कहना कि पढ़-लिखकर सब अफसर बन जाएँगे तो हमारे घर काम कौन करेगा। कहानी बड़ी मार्मिक बन पड़ी है। 'कौवे' कहानी हमारे समाज में फैले अन्धविश्वास को लेकर बुनी गई है, अगर किसी के सिर पर कौवा बैठ जाए तो उसकी मृत्यु की खबर रिश्तेदारों को भेजकर इसके अपशकुन से बचा जा सकता है। 'दीपदान' बच्चों के खेल-खेल में आँखों की रोशनी चले जाने पर कथा नायक अपने आपको जीवन भर अपराधी मानता है, और अंततः अपनी आँखों को दान कर स्वयं मौत को गले लगा लेता है। 'आफरीन' हिन्दू-मुस्लिम प्रेम विवाह की बेजोड़ कहानी है। किस प्रकार कट्टर ब्राह्मण मिसेज रचना त्रिवेदी को उनकी बहू अपने सौम्य व्यवहार से अंततः अपना बना लेती है। 'समरसता' आज आरक्षण की बहुत बड़ी विसंगति पर एक प्रश्न चिन्ह छोड़ती हुई कहानी है। कैसे एक ही समाज के दो परिवारों को सरकार की असंगत नीति के कारण, एक को लाभ और दूसरे को हानि झेलना पड़ती है। 'स्टेन्ट' कहानी चिकित्सा जैसे समाज सेवा के धर्म को डॉक्टरों ने पैसा कमाने का घिनौना पेशा बना लिया है, जहाँ आपके विश्वास का कैसे निर्ममतापूर्वक खून किया जा रहा है, पाठक पढ़कर तिलमिला उठता है। 'सलामी' गुमनामी में मरने वाले खिलाड़ी की कहानी है, जो अपना जीवन दूसरे की खातिर होम कर देता है। 'पुरस्कार' कहानी किस प्रकार सफलता के बाद हम अपने गुरु और मार्गदर्शक को भूल सफलता का श्रेय किसी और को देने की भूल कर बैठते हैं, को लेकर लिखी गई है। 'मकान' संग्रह की अंतिम कहानी है, जिसमें बताया गया है कैसे आज की पीढ़ी पैकेज और दौलत की चकाचौंध में अपने घर, परिवार और नाते-रिश्ते सबकुछ भुलाकर अपने ही सीमित, स्वार्थी संसार में जीना चाहते हैं।

    इस प्रकार इस संग्रह की सभी कहानियाँ पठनीय हैं, जो पाठक को शुरू से अंत तक बांधे रहती हैं। कहानियों की भाषा सहज-सरल है। कृति का आवरण आकर्षक और मुद्रण साफ-सुथरा है। प्रकाशक और लेखक दोनों को इस महत्वपूर्ण कहानी संग्रह हेतु बहुत-बहुत बधाई।


भास्कर राव इंजीनियर (कहानी-संग्रह)
रचनाकार- अरुण अर्णव खरे
पृष्ठ -
प्रकाशक- लोकोदय प्रकाशन
-----------------------------------------------------------------------
घनश्याम मैथिल ‘अमृत’

भोपाल
मो0- 9589251250

Monday, 24 February 2020

केदार के मुहल्ले में स्थित केदारसभगार में केदार सम्मान

हमारी पीढ़ी में सबसे अधिक लम्बी कविताएँ सुधीर सक्सेना ने लिखीं - स्वप्निल श्रीवास्तव 

सुधीर सक्सेना का गद्य-पद्य उनके अनुभव की व्यापकता को व्यक्त करता है - कौशल किशोर 

मित्रता और आत्मीयता का बड़ा कवि - अजीत प्रियदर्शी 

मुक्तिचक्र और जनवादी लेखक मंच द्वारा प्रदत्त किये जाने वाले जनकवि केदारनाथ अग्रवाल सम्मान 2018 का दो दिवसीय आयोजन बाँदा और कालिंजर में दिनांक 22 दिसम्बर और 23 दिसम्बर को सम्पन्न हुआ। यह सम्मान वरिष्ठ कवि सुधीर सक्सेना को दिया गया था अस्तु डीसीडीएफ स्थित कवि केदारनाथ अग्रवाल सभागार में आयोजित 22 दिसम्बर के आयोजन में चर्चा के केन्द्र में सुधीर सक्सेना का बहुआयामी व्यक्तित्व व रचनाकर्म रहा। अध्यक्षता वरिष्ठ कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने की व मुख्य वक्ता वरिष्ठ कवि रेवान्त के प्रधान सम्पादक एक्टिविस्ट श्री कौशल किशोर थे। अन्य वक्ताओं में लखनऊ से आये युवा आलोचक अजीत प्रियदर्शी, युवा कवि बृजेश नीरज और फतेहपुर से आये युवा कवि आलोचक प्रेमनन्दन रहे। शुरुआत में संचालक उमाशंकर सिंह परमार ने सुधीर सक्सेना का परिचय देते हुए उनके साथ अपने सम्बन्धों व उनकी कविताओं पर विस्तार से अपनी बात रखी। बाँदा में केदारबाबू के शिष्य वरिष्ठ गीतकार जवाहर लाल जलज ने सभी आगन्तुकों का स्वागत करते हुए जनकवि केदारनाथ अग्रवाल सम्मान की रूपरेखा और सार्थकता सबके सामने रखी व इस सम्मान को एक आन्दोलन का प्रतिफलन कहते हुए बाँदा में केदार की विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। लखनऊ से आए मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवि कौशल किशोर ने सुधीर सक्सेना, स्वप्निल और अपनी मित्रता के संस्मरण सुनाये तथा आज के खतरों से आगाह करते हुए इन खतरों के समक्ष बौनी पड़ रही पत्रकारिता पर दुख व्यक्त किया और कहा कि हिन्दी पत्रकारिता की पक्षधरता सच्चाई रही है वह सच से कभी पीछे नहीं रही। आज रघुवीर सहाय और सुधीर सक्सेना जैसे पत्रकारों को हमें अपने आदर्श पर रखना होगा। सुधीर सक्सेना की 'समरकन्द में बाबर' और 'अयोध्या' कविता का जिक्र करते हुए उनकी राजनैतिक विचारधारा और काव्य मर्म का उदघाटन किया। जनवादी लेखक मंच के सचिव प्रद्युम्न कुमार सिंह ने सुधीर सक्सेना पर सम्मान पत्र का वाचन किया और मुक्तिचक्र सम्पादक गोयल जी ने अंग वस्त्र भेंट किया। रामावतार साहू, रामकरण साहू, नारायण दास गुप्त, मुकेश गुप्त, रामप्रताप सिंह परिहार ने अतिथियों को अंंग वस्त्र देकर स्वागत किया। अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने प्रतीक चिह्न देकर सुधीर सक्सेना को जनकवि केदार सम्मान से सम्मानित किया। युवा आलोचक अजीत प्रियदर्शी ने सुधीर सक्सेना के कविता संग्रह 'किताबें दीवार नहीं जोतीं' का जिक्र करते हुए कहा आज हमारे समाज का सबसे बड़ा संकट है कि मैत्री भाव घटता जा रहा है। सुधीर सक्सेना ने अपने सौ मित्रों पर कविता लिखकर और विभिन्न शहरों पर कविता लिखकर आत्मीयता का रचाव किया है। प्रेमनन्दन ने कहा कि सुधीर सक्सेना ने सबसे अधिक और शानदार कविताएँ शहरों पर लिखी हैं। वह जिस भी शहर से जुड़े उसी पर लिखा। सम्मानित कवि सुधीर सक्सेना ने अपने संक्षिप्त वक्तव्य में बाँदा की धरती और बाँदा के साथ अपने लम्बे जुड़ाव का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि बाँदा को केन बाँधती है या फिर कविता और कोई भी बाँदा को घेर नहीं सकता। बाँदा की संस्कृति कविता की संस्कृति है, तुलसी से लेकर अब तक यह संस्कृति अडिग और अविचल भाव से चली आ रही है, निरन्तर आगे बढ़ती रहेगी। केदार की धरती में केदार सभागार मेंं केदार की विरासत के लिए काम कर रहे मुक्तिचक्र और जनवादी लेखक मंच द्वारा केदार सम्मान पाकर मैंं धन्य हूँ। सुधीर सक्सेना ने अपनी पाँच कविताओं का पाठ किया- काशी में प्रेम, विडम्बना कविता को लोगों ने खूब सराहा। युवा ग़ज़लकार कालीचरण सिंह ने बीच-बीच में अपनी ग़जल कहकर श्रोताओं की तालियाँ बटोरीं और सम्मान समारोह में रसवत्ता बनाये रखी। अध्यक्षता कर रहे स्वप्निल श्रीवास्तव ने सुधीर सक्सेना को अपनी पीढ़ी का एकमात्र कवि कहा जिसने सबसे अधिक लम्बी कवितायें लिखी और सुधीर सक्सेना को यह सम्मान मिलने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुये कहा कि हम सब इस ने समारोह में उपस्थित होकर फिर एक बार केदार की धरती की ऊर्जा देख ली । मुक्तिचक्र सम्पादक गोपाल गोयल ने केदार सम्मान की पीठिका बताते हुए कहा कि सुधीर सक्सेना कौशल किशोर स्वप्निल जी का बाँदा आना हमारे लिए बडी उपलब्धि है। गोष्ठी को वरिष्ठ अधिवक्ता आनन्द सिन्हा ,  रणवीर सिंह चौहान , रामकरण साहू, रामावतार साहू , चन्द्रपाल कश्यप जी ने भी सम्बोधित किया । और अन्त में डीसीडीएफ अध्यक्ष सीपीआईएम नेता वामपंथी विचारक सुधीर सिंह ने सभी आगन्तुकों का आभार व्यक्त किया ।

बुन्देली  अवशेषों में कविता की चमक 

बाँदा से लगभग साठ कीमी दूर मध्य प्रदेश की सीमा सतना और पन्ना से सटा हुआ चन्देलकालीन दुर्ग कालिंजर जनपद बाँदा की ऐतिहासिक धरोहर है कालिंजर को बाँदा के लोग भावुकता की हद तक प्यार करते हैं यही कारण है सरकारी बेरुखी और संसाधनों के अभाव के व खण्डित तथा ध्वस्त होने के बावजूद भी अपने भीतर बुन्देलखण्ड के पुरातन वैभव की कथा कह रहा है । रानी महल, अमान सिंह का महल, विभिन्न शैली में नृत्य आकृतियों से जटित दीवारों से युक्त विशाल रंगमहल, मृगदाव, शिव मन्दिर, बावडी, पोखर, तालाब, सैनिक कक्ष, राजदरबार, जैसे आकर्षक निर्मितियों को देखकर प्रतीत होता है कि बुन्देलखण्ड का स्थापत्य किसी जिन्दा कविता से कमतर नही है। रंगमहल में प्रवेश करते ही शीतलता का आभास होता है लम्बा चौडा आँगन और आँगन के चारो तरफ़ बारामदे हैं चारो तरफ ऊपर जाने की सीढिया हैं जिनसे चढ़कर हम सामने की छत पर बैठ गये इसी रंगमहल में कविता पाठ का आयोजन हुआ। रंगमहल में कविता पढ़ना एक बार पुनः इतिहास की ओर लौटना है । इस ध्वन्सावशेष मे कभी रात दिन संगीत और शब्द का झंकृत निनाद रहा होगा और उसी जगह पर पुनः शब्दों की गूँज उठी । अध्यक्षता स्वप्निल श्रीवास्तव ने की और संचालन स्वयं  सुधीर सक्सेना ने किया । पहली कविता संचालक ने पढ़ी जिसकी सराहना सभी ने की । जवाहर लाल जलज ने ओजस्वी शब्दों में व्यक्ति की जिजिविषा और जीवन के मध्य अन्तराल पर बात रखी । वरिष्ठ कवि कौशल किशोर ने "खोदा पहाड़ निकली चुहिया" कविता का पाठ किया जिसमे आज के बुद्धिजीवी वर्ग के खोखलेपन को उजागर किया गया है। प्रेमनन्दन ने जनवादी चेतना की प्रगतिशील कविताओं का पाठ किया उनकी कविता मेरा गाँव को लोगों ने पसंद किया । पीके सिंह ने अपनी प्रेम कविताओं का पाठ कर सबका मन मोह लिया । बृजेश नीरज ने हिन्दी गज़लों को पाठ किया बृजेश ने परिनिष्ठित भाषा मे ग़जल के व्याकरण का निर्वाह कर शानदार उदाहरण पेश किया। युवा ग़ज़लकार कालीचरण सिंह ने तरन्नुम की गज़ल कहीं उनकी गजल "कहीं और चलें चलें" को सबने सराहा। अजीत प्रियदर्शी ने अपनी निजी पीडाओं के आलोक में समूचे समाज और समाज के ठेकेदारों की नकली संवेदना को अपनी कविताओं में दिखाया। उमाशंकर सिंह परमार ने लौटना और सन्नाटा कविता का पाठ किया दोनो कवितायें रेवान्त के ताजा अंक में प्रकाशित हैं। जनवादी लेखक मंच के कोषाध्यक्ष नारायण दास गुप्त ने अपने बुन्देली लोक गीत खागा सकल पट्यौला खा गा और साईकिल के पिछले टायर का अगला होना कविताओं का पाठ किया। अध्यक्षता कर रहे स्वप्निल श्रीवास्तव में एक प्रेम कविता और एक बंजारे कविता का पाठ किया। उनकी बंजारे कविता की पंक्ति "जितना मै आगे बढता गया उतना ही पीछे छूटता गया" कालिंजर के इतिहास को भी व्यक्ति कर देती है समय और इतिहास जितना आगे बढता गया ऊँची पहाडी में स्थित यह ऐतिहासिक दुर्ग अपनी भव्यता खोता गया। अन्त में संचालक, कवि केदार सम्मान से सम्मानित कवि सुधीर सक्सेना ने घोषणा की कि दुनिया इन दिनो कवि केदारनाथ अग्रवाल पर जल्द ही विशेषांक लायेगी साथ ही कविता पाठ के समापन की घोषणा की। 

उमाशंकर सिंह परमार 

9838610776



Thursday, 12 December 2019

आलोचना का विपक्ष

साहित्य में ऐसे बहुत से लेखक कवि हैं, जिनका जन संघर्ष से दूर-दूर तक वास्ता नहीं। सरप्लस पूँजी से सैर- सपाटे और मौज-मस्ती करते हैं और अपने कमरे में बैठकर मार्क्स की खूब सारी किताबें पढ़कर जनचेतना का मुलम्मा अपने ऊपर चढ़ाते हैं। गोष्ठियों और मंचों पर  खूब भाषण देते हैं। भारतवर्ष में ऐसे नवबुजुर्वा लोकवादियों की कमी नहीं। ये मार्क्सवाद और लोक चेतना का चोला पहनकर अपनी गलत कमाई को सफेद  करना चाहते हैं। अपने पक्ष में एक माहौल बनाना चाहते हैं। ये पूँजीपतियों और सामंतों से कम खतरनाक नहीं है। इनका एक प्रमुख अभिलक्षण यह भी है कि ये केवल सत्ता का विरोध करते हैं, शोषक समाज का नहीं, क्योंकि यह उनके ही अंग होते हैं। लोक चेतना और वर्ग संघर्ष उनका मुखौटा है। उनका डीक्लासीफिकेसन एक छलावा है इसलिए हमारी लड़ाई केवल सत्ता और पूँजी  से नहीं, इन तथाकथित सफेदपोशों से भी है जो अपने  को वर्गविहीन कहकर हमें ठगते हैं।'' यह कथन इसी  आलोचना पुस्तक से है। इसी लोकधर्मी आलोचना की खराद में समकालीन हिंदी कविता के कवियों की कविताओं को रखा गया है। जो समकालीन हिंदी कविता के एक नये विमर्श को कविता  के  पाठकों  के  सामने  रखती  है |आज के  इस  चर्चित  आलोचक  का  पूरी  तरह  से  यह  मानना  है  की  ये  कवि  कविताओं  में या  तो  कलावाद  को मोमेंटम  प्रदान  करते  हैं या फिर  गद्य  लेखन  मार्क्सवाद , स्त्री  विमर्श  आदि  का  कोइ  न  कोइ  विचार  वितंडा  खड़ा  कर  अपने  को  सामने  लानें  का उपक्रम  करते  है  यह  तो  साहित्य  में  स्वयम  को  चर्चा  में  लाने  का सायास प्रयत्न  भर  है | निश्चय  ही सुशील कुमार  की  यह  आलोचना  पुस्तक  साहित्य  के  पाठकों  के  सामने  काव्य  आलोचना  के  महत्वपूर्ण   सवालों  को  लेकर  खड़ी  होती  है | यह  किताब  हाल  ही  में  लोकोदय प्रकाशन  लखनऊ  से  प्रकाशित  हुई  है |

Wednesday, 12 July 2017

गोरख पाण्डेय की कविताएँ

तमाम विद्रूपताओं और अंधे संघर्षों के बावजूद जीवन में उम्मीद और प्यार के पल बिखरे मिलते हैं. इन्हीं पलों को बुनने वाले कवि का नाम है गोरख पाण्डेय. इनकी कविताओं में जीवन और समाज की सच्चाईयाँ अपनी पूरी कुरूपता के साथ मौजूद हैं लेकिन इनके बीच जीवन का सौन्दर्य आशा की किरण बनकर निखर आता है.  


प्रस्तुत हैं सौन्दर्य और संघर्ष के कवि गोरख पाण्डेय की कुछ कविताएँ-

सात सुरों में पुकारता है प्यार 
(रामजी राय से एक लोकगीत सुनकर)

माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी

जोगी शिरीष तले
मुझे मिला

सिर्फ एक बाँसुरी थी उसके हाथ में
आँखों में आकाश का सपना
पैरों में धूल और घाव

गाँव-गाँव वन-वन
भटकता है जोगी
जैसे ढूँढ रहा हो खोया हुआ प्यार
भूली-बिसरी सुधियों और
नामों को बाँसुरी पर टेरता

जोगी देखते ही भा गया मुझे
माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी

नहीं उसका कोई ठौर ठिकाना
नहीं ज़ात-पाँत
दर्द का एक राग
गाँवों और जंगलों को
गुंजाता भटकता है जोगी
कौन-सा दर्द है उसे माँ
क्या धरती पर उसे
कभी प्यार नहीं मिला?
माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी

ससुराल वाले आएँगे
लिए डोली-कहार बाजा-गाजा
बेशक़ीमती कपड़ों में भरे
दूल्हा राजा
हाथी-घोड़ा शान-शौकत
तुम संकोच मत करना, माँ
अगर वे गुस्सा हों मुझे न पाकर

तुमने बहुत सहा है
तुमने जाना है किस तरह
स्त्री का कलेजा पत्थर हो जाता है
स्त्री पत्थर हो जाती है
महल अटारी में सजाने के लायक

मैं एक हाड़-माँस क़ी स्त्री
नहीं हो पाऊँगी पत्थर
न ही माल-असबाब
तुम डोली सजा देना
उसमें काठ की पुतली रख देना
उसे चूनर भी ओढ़ा देना
और उनसे कहना-
लो, यह रही तुम्हारी दुलहन

मैं तो जोगी के साथ जाऊँगी, माँ
सुनो, वह फिर से बाँसुरी
बजा रहा है

सात सुरों में पुकार रहा है प्यार

भला मैं कैसे
मना कर सकती हूँ उसे ?


हे भले आदमियो!
  
डबाडबा गई है तारों-भरी
शरद से पहले की यह
अँधेरी नम
रात।
उतर रही है नींद
सपनों के पंख फैलाए
छोटे-मोटे ह्ज़ार दुखों से
जर्जर पंख फैलाए
उतर रही है नींद
हत्यारों के भी सिरहाने।
हे भले आदमियो!
कब जागोगे
और हथियारों को
बेमतलब बना दोगे?
हे भले आदमियों!
सपने भी सुखी और
आज़ाद होना चाहते हैं।



तटस्थ के प्रति  

चैन की बाँसुरी बजाइए आप
शहर जलता है और गाइए आप
हैं तटस्थ या कि आप नीरो हैं
असली सूरत ज़रा दिखाइए आप



फूल और उम्मीद

हमारी यादों में छटपटाते हैं
कारीगर के कटे हाथ
सच पर कटी ज़ुबानें चीखती हैं हमारी यादों में
हमारी यादों में तड़पता है
दीवारों में चिना हुआ
प्यार।

अत्याचारी के साथ लगातार
होने वाली मुठभेड़ों से
भरे हैं हमारे अनुभव।

यहीं पर
एक बूढ़ा माली
हमारे मृत्युग्रस्त सपनों में
फूल और उम्मीद
रख जाता है।



समझदारों का गीत  
 
हवा का रुख कैसा है, हम समझते हैं
हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं, हम समझते हैं
हम समझते हैं ख़ून का मतलब
पैसे की कीमत हम समझते हैं
क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या है, हम समझते हैं
हम इतना समझते हैं
कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं।

चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं
बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं हम
हम बोलने की आजादी का
मतलब समझते हैं
टुटपुंजिया नौकरी के लिए
आज़ादी बेचने का मतलब हम समझते हैं
मगर हम क्या कर सकते हैं
अगर बेरोज़गारी अन्याय से
तेज़ दर से बढ़ रही है
हम आज़ादी और बेरोज़गारी दोनों के
ख़तरे समझते हैं
हम ख़तरों से बाल-बाल बच जाते हैं
हम समझते हैं
हम क्यों बच जाते हैं, यह भी हम समझते हैं।

हम ईश्वर से दुखी रहते हैं अगर वह
सिर्फ़ कल्पना नहीं है
हम सरकार से दुखी रहते हैं
कि समझती क्यों नहीं
हम जनता से दुखी रहते हैं
कि भेड़िया-धसान होती है।

हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं
हम समझते हैं
मगर हम कितना दुखी रहते हैं यह भी
हम समझते हैं
यहाँ विरोध ही बाजिब क़दम है
हम समझते हैं
हम क़दम-क़दम पर समझौते करते हैं
हम समझते हैं
हम समझौते के लिए तर्क गढ़ते हैं
हर तर्क गोल-मटोल भाषा में
पेश करते हैं, हम समझते हैं
हम इस गोल-मटोल भाषा का तर्क भी
समझते हैं।

वैसे हम अपने को किसी से कम
नहीं समझते हैं
हर स्याह को सफे़द और
सफ़ेद को स्याह कर सकते हैं
हम चाय की प्यालियों में
तूफ़ान खड़ा कर सकते हैं
करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं
अगर सरकार कमज़ोर हो
और जनता समझदार
लेकिन हम समझते हैं
कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं
हम क्यों कुछ नहीं कर सकते हैं
यह भी हम समझते हैं।



फूल  

फूल हैं गोया मिट्टी के दिल हैं
धड़कते हुए
बादलों के ग़लीचों पे रंगीन बच्चे
मचलते हुए
प्यार के काँपते होंठ हैं
मौत पर खिलखिलाती हुई चम्पई

ज़िन्दगी
जो कभी मात खाए नहीं
और ख़ुशबू हैं
जिसको कोई बाँध पाए नहीं

ख़ूबसूरत हैं इतने
कि बरबस ही जीने की इच्छा जगा दें
कि दुनिया को और जीने लायक बनाने की
इच्छा जगा दें।



रफ़्ता-रफ़्ता नज़रबंदी का ज़ादू घटता जाए है
  
रफ़्ता-रफ़्ता नज़रबंदी का ज़ादू घटता जाए है
रुख से उनके रफ़्ता-रफ़्ता परदा उतरता जाए है

ऊँचे से ऊँचे उससे भी ऊँचे और ऊँचे जो रहते हैं
उनके नीचे का खालीपन कंधों से पटता जाए है

गालिब-मीर की दिल्ली देखी, देख के हम हैरान हुए
उनका शहर लोहे का बना था फूलों से कटता जाए है

ये तो अंधेरों के मालिक हैं हम उनको भी जाने हैं
जिनका सूरज डूबता जाए तख़्ता पलटता जाए है।




समाजवाद  

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई
समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

हाथी से आई, घोड़ा से आई
अँगरेजी बाजा बजाई, समाजवाद...

नोटवा से आई, बोटवा से आई
बिड़ला के घर में समाई, समाजवाद...

गाँधी से आई, आँधी से आई
टुटही मड़इयो उड़ाई, समाजवाद...

काँगरेस से आई, जनता से आई
झंडा से बदली हो आई, समाजवाद...

डालर से आई, रूबल से आई
देसवा के बान्हे धराई, समाजवाद...

वादा से आई, लबादा से आई
जनता के कुरसी बनाई, समाजवाद...

लाठी से आई, गोली से आई
लेकिन अंहिसा कहाई, समाजवाद...

महंगी ले आई, ग़रीबी ले आई
केतनो मजूरा कमाई, समाजवाद...

छोटका का छोटहन, बड़का का बड़हन
बखरा बराबर लगाई, समाजवाद...

परसों ले आई, बरसों ले आई
हरदम अकासे तकाई, समाजवाद...

धीरे-धीरे आई, चुपे-चुपे आई
अँखियन पर परदा लगाई

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई
समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई



गुहार  

सुरु बा किसान के लड़इया चल तूहूँ लड़े बदे भइया।
कब तक सुतब, मूँदि के नयनवा
कब तक ढोवब सुख के सपनवा
फूटलि ललकि किरनिया, चल तूहूँ लड़े बदे भइया
सुरु बा किसान के लड़इया, चल तूहूँ लड़े बदे भइया।

तोहरे पसीवना से अन धन सोनवा
तोहरा के चूसि-चूसि बढ़े उनके तोनवा
तोह के बा मुठ्ठी भर मकइया, चल तूहूँ लड़े बदे भइया।
सुरु बा किसान के लड़इया, चल तूहूँ लड़े बदे भइया।

तोहरे लरिकवन से फउजि बनावे
उनके बनूकि देके तोरे पर चलावे
जेल के बतावे कचहरिया, चल तूहूँ लड़े बदे भइया।
सुरु बा किसान के लड़इया, चल तूहूँ लड़े बदे भइया।

तोहरी अंगुरिया पर दुनिया टिकलि बा
बखरा में तोहरे नरके परल बा
उठ, भहरावे के ई दुनिया, चल तूहूँ लड़े बदे भइया।
सुरु बा किसान के लड़इया, चल तूहूँ लड़े बदे भइया।


जनमलि तोहरे खून से फउजिया
खेत करखनवा के ललकी फउजिया
तेहके बोलावे दिन रतिया, चल तूहूँ लड़े बदे भइया।
सुरु बा किसान के लड़इया, चल तूहूँ लड़े बदे भइया।

साहित्यिक जगत में शिवना सम्मानों की गूँज: लीलाधर मंडलोई को 'अंतर्राष्ट्रीय शिवना सम्मान'

  - मुकेश नेमा और स्मृति आदित्य को कृति सम्मान सीहोर। नए वर्ष की ऊर्जा और साहित्यिक उल्लास के बीच 'शिवना प्रकाशन' द्वारा वर्ष 2025 क...