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दलित और आदिवासी स्वरों की संवेदना समझनी होगी: नागर

प्रयास संस्थान की ओर से सूचना केंद्र में शनिवार को आयोजित समारोह में वर्ष 2014 का डॉ. घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार जयपुर के ख्यातनाम साहित्यकार भगवान अटलानी को दिया गया। नामचीन लेखक-पत्राकार विष्णु नागर के मुख्य आतिथ्य में हुए कार्यक्रम में उन्हें यह पुरस्कार एकांकी पुस्तक सपनों की सौगातके लिए दिया गया।
समारोह को संबोधित करते हुए नागर ने कहा कि आज हमारा समाज धर्म और जातियों में इस प्रकार बंट गया है कि हम एक-दूसरे से ही खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं लेकिन हमें यह समझना होगा कि यदि परस्पर भरोसा कायम नहीं रहा तो केवल तकनीक और वैज्ञानिक प्रगति के सहारे ही हम सुखी नहीं रह सकते। उन्होंने कहा कि हजारों वर्षों के अन्याय और शोषण के बाद अब दलित और आदिवासी स्वर उठने लगे हैं तो हम उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते बल्कि हमें उन स्वरों की संवेदना को समझना चाहिए। जब तक समाज के तमाम तबकों की भागीदारी तय नहीं होगी, समाज और देश की एक बेहतर और संपूर्ण तस्वीर संभव नहीं है। अटलानी के रचनाकर्म पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए नागर ने कहा कि वर्तमान में व्यक्ति तमाम तरह के अंतर्विरोधों से घिरा हुआ है और हमारे आचरणों को परिभाषित करने वाली कोई सरल विभाजक रेखा यहाँ नहीं है। व्यवस्था की विसंगतियों ने ईमानदार आदमी के जीवन को दूभर बना दिया है और आदर्शवाद के सहारे हमारी बुनियादी दिक्कतें हल नहीं हो रही हैं। उन्होंने कहा कि आज भारतीय भाषाओं के साथ षड्यंत्र करते हुए यह कहा जा रहा है कि जो भी अच्छा लिखा जा रहा है, वह केवल अंग्रेजी में लिखा जा रहा है। हमें इस साजिश को समझना होगा और इस चुनौती का जवाब अपनी रचनात्मकता और सक्रियता से देना होगा।

मुख्य वक्ता एवं प्रख्यात साहित्यकार श्योराज सिंह बेचैन ने कहा कि देश के बौद्धिक जगत में कभी आदिवासी और दलित नहीं रहे और जो लोग रहे, उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं किया लेकिन यह देश दलितों और आदिवासियों का भी है। सैकड़ों सालों से हमने आदिवासी-दलितों के संदर्भ में जो क्षति पहुँचाई है, उसकी पूर्ति की इच्छा भी कभी तो हममें जागनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि कोई साहित्यकार अपना भोगा हुआ लिखता है तो निस्संदेह उसकी प्रामाणिकता सर्वाधिक कही जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि देश में कोई भी जाति कमजोर होगी, तो देश कमजोर होगा।
पुरस्कार से अभिभूत भगवान अटलानी ने कहा कि आदर्श और यथार्थ के बीच दूरियाँ नहीं होनी चाहिए। तमाम यथार्थ को भोगते हुए और उससे जूझते हुए हमें एक आदर्श स्थापित करना चाहिए ताकि हम समाज को अच्छा बनाने की दिशा में एक योगदान दे सकें। आदर्शों की ऊँचाइयों पर व्यक्ति पहुँचे, मेरा समग्र साहित्य इसी दिशा में एक समर्पण है।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात गणितज्ञ डॉ. घासीराम वर्मा ने कहा कि हमें किताबें खरीदकर पढ़ने की प्रवृत्ति खुद में विकसित करनी चाहिए। जिस व्यक्ति के पास दो से अधिक कमीज-पतलून है, उसे अपनी आवश्यकताओं में कटौती कर पुस्तकें खरीदनी और पढ़नी चाहिए। उन्होंने कहा कि आज देश के वैज्ञानिकों ने मंगल पर यान भेजकर बड़ी सफलता अर्जित की है लेकिन उन्हें मीडिया में उतनी तवज्जो नहीं मिल रही, जितनी कुछ दूसरी फिजूल चीजों को मिल रही है। विशिष्ट अतिथि डॉ. श्रीगोपाल काबरा ने आयोजन के लिए प्रयास संस्थान की सराहना की। वरिष्ठ साहित्यकार भंवर सिंह सामौर ने आभार जताया। इससे पूर्व अतिथियों ने दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। प्रयास के अध्यक्ष दुलाराम सहारण ने आयोजकीय रूपरेखा पर प्रकाश डाला। संचालन कमल शर्मा ने किया। समारोह में ख्यातनाम साहित्यकार रत्नकुमार सांभरिया, रियाजत खान, युवा जागृति संस्थान के अध्यक्ष जयसिंह पूनिया, रामेश्वर प्रजापति रामसरा, नरेंद्र सैनी, रामगोपाल बहड़, ओम सारस्वत, हनुमान कोठारी, बाबूलाल शर्मा, उम्मेद गोठवाल, कुमार अजय, डॉ. कृष्णा जाखड़, सुनीति कुमार, विजयकांत, डॉ. रामकुमार घोटड़, माधव शर्मा, उम्मेद धानियां, बजरंग बगड़िया, केसी सोनी, आरके लाटा, सुरेंद्र पारीक रोहित, श्रीचंद राजपाल सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार, मीडियाकर्मी एवं नागरिक मौजूद थे। 

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