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अरुन शर्मा अनन्त की बात

समाज में असहज परिवर्तन मनुष्य के भीतर की समाप्त होती संवेदनाएँ, बड़प्पन और अनुजता के मधुर संबंधों में विच्छेद मनुजता के लिए अत्यंत हानिकारी होता जा रहा है. भावनाएँ दिन प्रतिदिन मलिन होती जा रही हैं, स्वयं को सर्वेसर्वा बनाने की जद्दोजहद में परस्पर प्रेम - व्यवहार का अंत हो रहा है. 

निंदनीय कार्यों में होती वृद्धि गिरी हुई मानसिकता के शिकार होते लोग, सभ्यता, संस्कृति, मान, मर्यादा को रौंद कर अपने मन की करने को आतुर आने वाली पीढ़ी अंधकारमय होती जा रही है. आने वाली पीढ़ी को दिशा देना समाज का धर्मं होता है किन्तु परिस्थिति अत्यंत दुःखद है समाज स्वयं दिशाहीन, समाज को उचित मार्ग दिखानेवाला साहित्य मठाधीशों एवं बहुत से फ़ालतू लोगों से भरा पड़ा है. 

मेरे अग्रज बृजेश नीरज जी कहते हैं " जिनके पास करने को कुछ नहीं होता, एकाध तुकबन्दी कर लेंगे, उसके बाद शुरू कर देंगे मठाधीशी. ऐसे लोग तमाम तरह के फसाद विभिन्न विषयों को लेकर करते रहते हैं. खुद को स्थापित करने और मान्यता दिलाने के उनके ये प्रयास सफल तो नहीं हो पाते, हाँ, कुछ मूढ़ व्यक्तियों के समर्थन से चर्चित जरूर हो जाते हैं. साहित्य अध्ययन और लगन दो…

ऐतिहासिक कथानक को सांस्कृतिक समझ से साथ उद्घाटित करता नाटक

राहुल देव
पुस्तक- सिद्धार्थ (नाटक) लेखक- राजेन्द्र सिंह बघेल प्रकाशक- यथार्थ प्रकाशन, नई दिल्ली
‘नाटक, काव्य का एक रूप है। जो रचना श्रवण द्वारा ही नहीं अपितु दृष्टि द्वारा भी दर्शकों के हृदय में रसानुभूति कराती है उसे नाटक या दृश्य-काव्य कहते हैं। नाटक में श्रव्य काव्य से अधिक रमणीयता होती है। श्रव्य काव्य होने के कारण यह लोक चेतना से अपेक्षाकृत अधिक घनिष्ठ रूप से संबद्ध है। नाट्यशास्त्र में लोक चेतना को नाटक के लेखन और मंचन की मूल प्रेरणा माना गया है।‘ नाटक की यह परिभाषा उदृत करने का उद्देश्य मात्र इतना है कि हिंदी साहित्य में नाटकों की रचना की एक समृद्ध परम्परा रही है लेकिन आज के समय में इस विधा में साहित्यकारों की रूचि घटती सी जा रही है| सब कविता, कहानी, उपन्यास के पीछे भाग रहे हैं जिससे साहित्य की अन्य विधाएँ उपेक्षित होती हैं| नाटक विधा भी उनमें से एक है, आज बहुत कम नाटक लिखे जा रहे हैं| हमें जानना चाहिए कि नाटक क्या है, नाटक की साहित्यिक परम्परा क्या है, उसके साहित्यिक मूल्य क्या हैं| ऐसे समय में इस समीक्ष्य किताब का मेरे हाथ में आना एक सुखद एवं स्वागतयोग्य प्रस्तुति है|
अभी तक बुद्ध…

कुछ अपनी बात

ऋतुराज बसंत! शरद ऋतु की समाप्ति तथा ग्रीष्म के आगमन अर्थात् समशीतोष्ण वातावरण के प्रारम्भ होने का संकेत है बसंत। यह सृजनात्मक शक्ति के नव पल्लवन की ऋतु है। यह मौसम प्रकृति की सरसता में ऊर्जा का संचार करता है। यही कारण है कि इस मौसम में न केवल प्रकृति का कण-कण खिल उठता है वरन मानव, पशु-पक्षी सभी उल्लास से भर जाते हैं। तरंगित मन, पुलकित जीवन का मौसम बसंत जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, आशा व विश्वास उत्पन्न करता है; नए सिरे से जीवन को शुरू करने का संकेत देता है।  भारतीय सभ्यता- संस्कृति का सर्वोच्च त्यौहार होली बसंत ऋतु में मनाया जाता है। होली उल्लास का पर्व है। होली प्रतीक है अल्हड़ता का, उमंग का, रंगों का। होली के माध्यम से जीवन में उत्साह का संचार होता है। इस मौसम की मादकता से कोई अछूता नहीं रहता है। चारों ओर बिखरे रंग और उन्मुक्त हास-परिहास के बीच व्यक्ति इस आनंद-पर्व से अनुप्राणित होकर रंग-रस से सराबोर हो उठता है। इस मौसम ने साहित्यकारों को भी अनुप्राणित किया है। यही कारण है कि हिन्दी साहित्य बसंत, फागुन और होली की रचनाओं से भरा पड़ा है! ऐसी ही कुछ चुनिन्दा रचनाओं का संकलन हम धरोहर के दूसर…

“अपनी-अपनी हिस्‍सेदारी“ का लोकार्पण

विश्‍व पुस्‍तक मेले में दिनांक 22 फरवरी, 2015 को हिन्‍दी अकादमी, दिल्‍ली के प्रकाशन सौजन्‍य से मंजुली प्रकाशन द्वारा सद्यय प्रकाशित सुश्री संगीता शर्मा ‘अधिकारी’ के प्रथम कविता संग्रह “अपनी-अपनी हिस्‍सेदारी“ का लोकार्पण कार्यक्रम प्रात: 11 बजे, लिखावट, कविता और विचार के मंच की ओर से हॉल न0 8, साहित्‍य मंच पर किया गया। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता श्री मिथिलेश श्रीवास्‍तव ने की। आमंत्रित वक्‍ता श्री लक्ष्‍मी शंकर वाजपेयी, श्री अमर नाथ अमर, सुश्री अलका सिन्‍हा, सुश्री पुष्‍पा सिंह विसेन और श्री मनोज कुमार सिंह थे। सभी वक्‍ताओं ने वर्तमान कविता में विशेष रूप से पाए जाने वाले प्रेम, स्‍त्री-विमर्श, घर-परिवार, रिश्‍ते-नाते और समाज-राजनीति से लेकर वैश्विक सरोकारों के बीच उनकी कविताओं को व्‍याख्‍यायित किया तथा नवोदित कवियों में एक अलग तरह के मुहावरे के बीच अपनी पहचान बनाती हुई कविताएँ बताया। साथ ही उन्‍होंने ‘संभावनाओं की जमीन तलाशती कविताओं’ के लिए युवा कवयित्री सुश्री संगीता शर्मा ‘अधिकारी’ को उनके प्रथम सृजनात्‍मक प्रयास की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ दीं। कार्यक्रम का बेहतरीन संचालन श्री अरविं…

कुछ अपनी बात

धरोहर! नामचीन साहित्यकारों की रचनाओं के संकलन की एक नयी श्रंखला इस अंक के साथ हम शुरू करने जा रहे हैं. इस श्रंखला का नाम होगा- ‘धरोहर’. इसके तहत साहित्य की अलग-अलग विधाओं पर केन्द्रित ऐसे अंक हम समय-समय पर आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगे जिनमें नामचीन साहित्यकारों की प्रसिद्द रचनाओं का संकलन होगा.  यूँ तो हर अंक में हम ‘नाद अनहद’ नाम से विश्व के प्रसिद्द साहित्यकारों की रचनाओं का प्रकाशन करते रहे हैं लेकिन शायद उतना पर्याप्त नहीं. विश्व साहित्य इतनी कालजयी रचनाओं से भरा पड़ा है कि उन्हें कुछ पन्नों के सहारे समेट पाना असंभव है, इसलिए इस अंक के साथ हम विशेषांकों की इस नयी श्रंखला को शुरुआत कर रहे हैं जिसमें विधा विशेष की प्रसिद्द रचनाओं को अपने पाठकों के लिए उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाएगा. यह पहला अंक कहानी विधा पर केन्द्रित है और एक प्रयोग के तौर पर केवल ६ कहानियों को सम्मिलित करते हुए इस अंक को आपके समक्ष प्रस्तुत किया गया है. इस अंक पर आपके सुझावों की हमें प्रतीक्षा रहेगी. आपके मार्गदर्शन की सहायता से हम आगामी विशेषांकों को और बेहतर बनाने का प्रयास करेंगे. 
- बृजेश नीरज

लघुकथा- मिलन वार्ता

2015 और 2014 के उस एक क्षण के मिलन में 2015 ने 2014 से पूछा, "बड़े भाई, आपका आशीर्वाद दें, साथ ही अपना अनुभव भी बताएँ, मुझे 365 दिनों का श्वास मिला है, ये दिन कैसे काटूँ ताकि जीवन शांत और अर्थपूर्ण रहे|"
2015 ने कहा, "कोशिश करो कि प्रकृति और मानव के बीच एक सेतु बनो ताकि दोनों एक दूसरे से लाभान्वित हों, उन सारे तत्वों को संभाल कर रखो जो कि मानव-जीवन के लिए उपयोगी हैं| मानव की और अधिक चिंता मत करो, उन्हें तुम्हारे 365 दिनों की उम्मीद देने वाले बहुत से हैं| मानव एक दिन लड़ेगा और दूसरे दिन शांति की बात करेगा| उसके लिए प्रकृति की सुरक्षा से अधिक आवश्यक है स्वयं का भोग, उसके लिये ईश्वरीय शांति पाने से ज़रूरी है अपनी भड़ास निकालना और सत्कर्मों से अधिक आवश्यक है- मीठी-मीठी बातें करना| ये सभी के सभी तुम्हारे दिनों का हवाला देकर होंगे|
लेकिन, एक आवश्यक सच सदैव याद रखना कि तुम्हारे अंतिम दिवस पर कोई रोयेगा नहीं, कोई यह नहीं कहेगा कि तुमने365 दिनों तक मानव का साथ दिया, प्रत्येक व्यक्ति 2016 के स्वागत में ही खुशियाँ मनायेगा| यह तो मानव का कर्म है, पर तुम इस छोटी सी बात के लिए अपने धर्म से…

संगीता शर्मा की कविता

संगीता शर्मा ‘अधिकारी’

पोषित पीठ 

क्यों सोचते हो तुम
तुम्हारी पीठ पर
कोई हो

क्या फ़र्क पड़ता है
इस बात से
कि कोई पोषित करे
तुम्हारी पीठ

क्या सिर्फ इसलिए
कि कोई न चढ़ बैठें
तुम्हारी छाती पर

पर क्यों नहीं सोचते तुम
बित्ती भर भी
कि किसी की छाती पर चढ़ना
इतना आसान नहीं

ग़र होता
तो
कर्म गौण
और
बल प्रधान
हो गया होता