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Showing posts from December, 2014

स्मृति- यशस्वी साहित्यकार अनंतमूर्ति

भारतीय साहित्‍य के महान कथाकार यू आर अनंतमूर्ति बेशक दैहिक रूप से हमारे बीच न रहे हों, लेकिन एक यशस्‍वी रचनाकार के रूप में उनकी उपस्थिति साहित्‍य जगत में सदैव अनुभव की जाती रहेगी। वे कन्‍नड़ भाषा के उन युगान्‍तरकारी रचनाकारों में थे, जिन्‍होंने भारतीय चिन्‍तन धारा को नया उन्‍मेष दिया। 21 दिसंबर, 1932 को कर्नाटक के तीर्थहल्‍ली तालुक के छोटे-से कस्‍बे मेलिगे मेंजन्‍मे अनंतमूर्ति ने अपनी आठ दशक की जीवन-यात्रा में भारतीय साहित्‍य को अमूल्‍य योगदान दिया। साहित्‍य की विभिन्‍न विधाओं में उनकी 20 से अधिक कृतियाँ प्रकाशित हैं, जिनमें 'संस्‍कार', 'भारतीपुर', 'अवस्‍थे' और 'भव' जैसे प्रसिद्ध उपन्‍यासों के अलावा 5 कहानी संग्रह, 3 काव्‍य-संग्रह, एक नाटक और 5 समीक्षा ग्रंथ अपना विशिष्‍ट स्‍थान रखते हैं।
          प्रो अनंतमूर्ति के बारे यह सर्वविदित है कि उनकी पूरी सृजन-यात्रासामाजिक रूढ़ियों और गैर-बराबरी के विरुद्ध एक विद्रोही मानवतावादी लेखक की रचनात्‍मक यात्रा रही हैऔर अपने लोकतांत्रिक विचारों और मानवीय सिद्धान्‍तों पर कायम रहने वाले एक बेबाक व्‍यक्ति के रू…

यादों से- संजय मिश्र ‘हबीब’

स्व. संजय मिश्र 'हबीब'
कह मुकरी गोदी में सिर रख सो जाऊँ
कभी रात भर संग बतियाऊँ रस्ता मेरा देखे दिन भर क्या सखि साजन? ना सखि बिस्तर - - - - -

ग़ज़ल
फिर मिलेंगे अगर खुदा लाया

क्या पता अच्छा या बुरा लाया। चैन दे, तिश्नगी उठा लाया।
जो कहो धोखा तो यही कह लो, अश्क अजानिब के मैं चुरा लाया।
क्यूँ फिजायें धुआँ-धुआँ सी हैं, याँ शरर कौन है छुपा लाया।
बाग में या के हों बियाबाँ में, गुल हों महफूज ये दुआ लाया।
लूटा वादा उजालों का करके, ये बता रोशनी कुजा लाया?
मेरा साया मुझी से कहता है, अक्स ये कैसा बदनुमा लाया।  
लो सलाम आखिरी कजा लायी, फिर मिलेंगे अगर खुदा लाया।
             हो मेहरबाँ 'हबीब' उसुर मुझपे,                        इम्तहाँ रोज ही जुदा लाया। - - - - - 
लघुकथाएँ चाबी
राजकुमार तोते को दबोच लाया और सबके सामने उसकी गर्दन मरोड़ दी. “तोते के साथ राक्षस भी मर गया” इस विश्वास के साथ प्रजा जय-जयकार करती हुई सहर्ष अपने-अपने कामों में लग गई।

उधर दरबार में ठहाकों का दौर तारीं था. हंसी के बीच एक कद्दावर, आत्मविश्वास भरी गंभीर आवाज़ गूँजी. “युवराज! लोगों को पता ही नहीं चल पाया कि हमने अपनी ‘जान’ तोते में से निकालक…

संगीता शर्मा की दो कविताएँ

          संगीता शर्मा ‘अधिकारी’

चाय की प्याली

चाय की प्याली का
होठों तक आते-आते रुक जाना
उड़ने देना भाप को
ऊँचा और ऊँचा
उस ऊँचाई के ठीक नीचे से
सबकी नज़रे बचा
प्याली का बट जाना
दो हिस्सों में
आज भी बहुत सताता है
आज भी बहुत याद आता है ।
     - - - - -

ग्लोबल वार्मिंग

बाहर-भीतर
भिन्न व्यवहार करना
गिरगिट की मानिंद
रंग बदलना
स्वयं का दंभ भरना
अपनी कुटिल हँसी में
सैकड़ों को निपटाना
तो कोई आपसे सीखे

यही विशेषण
आपको कुर्सी पर जमाए हुए है
किन्तु ‘सावधान‘
ग्लोबल वार्मिंग में
सब कुछ
पिघलने लगा है |

प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा की दो लघुकथाएँ

प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा 
बाल श्रम कई प्रतिष्ठित समाजसेवी संगठनों में उच्च पदधारिका तथा सुविख्यात समाज सेविका निवेदिता आज भी बाल श्रम पर कई जगह ज़ोरदार भाषण देकर घर लौटीं. कई-कई कार्यक्रमों में भाग लेने के उपरान्त वह काफी थक चुकी थीं. पर्स और फाइल को मेज पर फेंकते हुए निढाल सोफे पर पसर गईं. झबरे बालों वाला प्यारा सा पप्पी तपाक से उनकी गोद में कूद गया.
"रमिया! पहले एक ग्लास पानी ला... फिर एक कप गर्म-गर्म चाय......"
दस-बारह बरस की रमिया भागती हुई पानी लिए सामने चुपचाप खड़ी हो जाती है.
"ये बता री, आज पप्पी को टहलाया था?"

"माफ़ कर दो मेम साब, सारा दिन बर्तन माँजने, घर की सफाई और कपडे धोने में निकल गया इसलिए आज पप्पी को टहला नहीं पाई...." - - - - - 
आइना
“नीलम, जब से तुम इस घर में ब्याह के आई तभी से घर-बाहर, टॉयलेट आदि की साफ-सफाई करती रही हो. अब ये सब कैसे होगा डॉक्टर ने तुम्हें शारीरिक श्रम हेतु मना किया है। क्यों न इस कार्य हेतु किसी को रख लिया जाए.” नीलम ने सकुचाते हुए कहा, “मुझे कोई आपत्ति नहीं पर आप तो महात्मा गाँधी के सच्चे अनुयायी हैं।“

अनुपमा सरकार की कविता

                अनुपमा सरकार

हाथों की लकीरों में


जाने क्या ढूँढती हूँ
हाथों की इन लकीरों में
शायद उलझे सपने, झूठी ख्वाहिशें
बेतरतीब ख्वाब, अनसुलझे सवाल और...
और क्या!

अरे! ढूँढने से कभी कुछ मिला है क्या?
ये लकीरें, तकदीरें तो
पलटती ही रहती हैं हर पल
मौसम की तरह
बस, जब जो मिले
वह काफी नहीं होता

है जीवन एक अनंत सफर
और हम अनथक पथिक
राहें समझते-समझते
मंज़िलें बदल जाती हैं

क्यों न तुझे ही

किरण सिंह

शब्द चुनकर छन्द में गढ़  उठे मन के भावना भर
सुन्दर सॄजन कर डालूँ
क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ

कोरा कागज़ मन मेरा है
जहाँ तुम्हारा चित्र सजा है
तेरे प्रीत से चित्र रंगा लूँ
क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ

नित्य भोर उठ प्रीति भैरवी
हाथ जोडकर करूँ पैरवी
रागिनियाँ संग राग मिला लूँ
क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ

शाम सुनहरी सज रही है
ताल लय में बज रही है
तुझ संग गीतों को मैं गा लूँ
क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ

रात चाँद और तारे प्रहरी
नयन देखते स्वप्न सुनहरी
कुछ पल तेरे संग बिता लूँ
क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ

अभिनव अरुण को ‘’आगमन साहित्य सम्मान‘’

आगमन वार्षिक सम्मान समारोह रविवार दिनांक 23 नवम्बर 14 को कैलाश हॉस्पिटल, नोएडा के प्रेक्षागृहमें आयोजित किया गया | कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ० केशरी लाल वर्मा (चेयरमैन, तकनीकी एवं वैज्ञानिक शब्दावली आयोग एवं निदेशक, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली) ने कीतथा "काव्य-संध्या" सत्र की अध्यक्षता मशहूर शायर डॉ० गुलज़ार देहलवी एवं वरिष्ठ साहित्यकार प्रो० लल्लन प्रसाद ने की। मुख्य अतिथि के रूप में डॉ० मधुप मोह्टा (वरिष्ठ साहित्यकार एवं भारतीय विदेश सेवा) तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में सर्वश्री लक्ष्मी शंकर बाजपेई (उपमहानिदेशक, आकाशवाणी, नई दिल्ली), डॉ० हरि सुमन विष्ट (सचिव, हिंदी अकादमी, दिल्ली), डॉ० रमा सिंह (वरिष्ठ गीतकार एवं कवयित्री) एवं आलोक यादव (क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त, बरेली) उपस्थित रहे। इस अवसर पर आकाशवाणी वाराणसी में वरिष्ठ उद्घोषक एवं युवा ग़ज़लकार अभिनव अरुण को साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए ‘’आगमन साहित्य सम्मान २०१४‘’ प्रदान किया गया | इस अवसर पर 4 पुस्तकों एवं 1 एल्बम का लोकार्पण भीहुआ। देशभर से 20 से अधिक कवि-कवयित्रियों व साहित्यकारों को सम्मानित क…

माँ

- राम दत्त मिश्र ‘अनमोल’
सपने में माँ मिलती है। कली हृदय की खिलती है।।
करुणा की है वो मूरत, आँसू देख पिघलती है।
सुखी रहे मेरा जीवन, नित्य मनौती करती है।
बिठा के मुझको गोदी में, सौ-सौ सपने बुनती है।
उसकी तो नाराजी भी, आशीषों-सी फलती है।
नहीं किसी के दल में है, नहीं किसी से जलती है।
भटक न जाऊँ कभी कहीं, थाम के अँगुली चलती है।
दुख-तम हरने को  ‘अनमोल’, दीप सरीखी जलती है।।

‘सारांश समय का’ लोकार्पण समारोह एवं काव्य गोष्ठी

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली के ‘अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन केंद्र’ में 'शब्द व्यंजना' और 'सन्निधि संगोष्ठी' के संयुक्त तत्वाधान में 'सारांश समय का' कविता-संकलन का लोकार्पण समारोह एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया.

कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसून लतांत ने की, जबकि लक्ष्मी शंकर वाजपेयी मुख्य अतिथि एवं रमणिका गुप्ता, डॉ. धनंजय सिंह, अतुल प्रभाकर विशिष्ट अतिथि के रूप में कार्यक्रम में उपस्थित थे. कार्यक्रम के मुख्य वक्ता अरुण कुमार भगत थे तथा संचालन महिमा श्री ने किया. इस आयोजन में बड़ी संख्या में कवि, लेखक तथा साहित्य प्रेमी सम्मिलित हुए. कार्यक्रम दोपहर ढाई बजे से शाम सात बजे तक चला. 'सारांश समय का' कविता संकलन का संपादन बृजेश नीरज और अरुण अनंत ने किया है.  इस संकलन में अस्सी रचनाकारों की बेहतरीन कविताएँ सम्मिलित हैं जिसकी सराहना अतिथियों ने की. लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ने कविताओं के चयन की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा कि यह संकलन हिन्दी साहित्य के लिए शुभ संकेत देता है. इसमें कई मुक्कमल कविताएँ हैँ. उन्होंने संकलन में सम्मिलित कई कविताओं का सस्वर पाठ कर रच…

लघु कथा- रक्षा बंधन

अलीशा माँ की उँगली पकड़े लगभग घिसटती-सी चली जा रही थी। उसकी नजरें सड़क के दोनों ओर दुल्हन-सी सजी मिठाई और राखी की दुकानों पर टिकी थीं। दोनों जब पुष्पा दीदी के घर पहुँचे तो वहाँ भी रक्षा बंधन के पर्व पर जश्न का माहौल था। पुष्पा दीदी की पौत्री अंशिका जब अपने भाई अंशु की कलाई में रक्षा सूत्र बाँध रही थी तब कोने में शांत बैठी अलीशा के दिल में उठ रहे भावों को अंशु ने पढ़ लिया। अंशिका जब रक्षा सूत्र बाँध चुकी तो अंशु ने थाली में से एक रक्षा सूत्र उठाया और अलीशा को थमाते हुए अपनी कलाई उसकी ओर बढ़ा दी। अलीशा सकपकाते हुए बोली, “मैं मुसलमान....” 
अंशु बोला, “तुम और कोई नहीं सिर्फ और सिर्फ मेरी बहन हो!” - प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा

हाइकु गीत

रक्त रंजित होरहेफिर फिर हमारेगाँव।
हरतरफ विद्वेष कीलपटें हवाहैगर्म,
चलरहा है हाथमेंतलवार लेकरधर्म,
बढ़ रहें हैं अनवरतआगे घृणाकेपाँव।
भयजगाती अपरचितध्वनि रोकती पथ,
डगमगाता सहजजीवनका सुखदरथ,
नहींमिलती दग्धमनकोक

राहुल देव - परिचय

राहुल देव जन्म- 20 मार्च 1988
माता- श्रीमती मंजू श्रीवास्तव
पिता- श्रीप्रकाश
शिक्षा- एम.ए. (अर्थशास्त्र), बी.एड.
प्रकाशित– एक कविता संग्रह, पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतरजाल मंचों पर कवितायें/लेख/ कहानियां/ समीक्षाएं आदि|
शीघ्र प्रकाश्य- एक बाल उपन्यास एक कविता संग्रह तथा एक कहानी संग्रह|
सम्मान- अखिल भारतीय वैचारिक मंच, लखनऊ तथा हिंदी सभा, सीतापुर द्वारा पुरुस्कृत|
रूचि- साहित्य अध्ययन, लेखन, भ्रमण
सम्प्रति- उ.प्र. सरकार के एक विभाग में कार्यरत|
संपर्क सूत्र- 9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध), सीतापुर, उ.प्र. 261203
मो.– 09454112975
ईमेल- rahuldev.bly@gmail.com

त्याग और समर्पण ही सच्चा प्रेम है

एक स्त्री का जब जन्म होता है तभी से उसके लालन-पालन और संस्कारों में स्त्रीयोचित गुण डाले जाने लगते हैं| जैसे-जैसे वह बड़ी होती है उसके
अन्दर वे गुण विकसित होने लगते हैं| प्रेम, धैर्य, समर्पण, त्याग ये सभी भावनाएँ वह किसी के लिए संजोने लगती है और यूँ ही मन ही मन किसी अनजाने-अनदेखे राजकुमार के सपने देखने लगती है और उसी अनजाने से मन ही मन प्रेम
करने लगती है| किशोरावस्था का प्रेम यौवन तक परिपक्व हो जाता है, तभी दस्तक होती है दिल पर और घर में राजकुमार के स्वागत की तैयारी होने लगती है| गाजे-बाजे के साथ वह सपनों का राजकुमार आता है, उसे ब्याह कर ले जाता है जो वर्षों से उससे प्रेम कर रही थी, उसे लेकर अनेकों सपने बुन रही थी|
उसे लगता है कि वह जहाँ जा रही है किसी स्वर्ग से कम नही, अनेकों सुख-सुविधाएँ बाँहें पसारे उसके स्वागत को खड़े हैं| इसी झूठ को सच मानकर
वह एक सुखद भविष्य की कामना करती हुई अपने स्वर्ग में प्रवेश कर जाती है| कुछ दिन के दिखावे के बाद कड़वा सच आखिर सामने आ ही जाता है