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Showing posts from August, 2014

यादें

दिन भर अपनी चमक से कोना-कोना गरमाता
यह सूरज अब
धीरे-धीरे
अपनी गुफा की तरफ़ जाएगा
हौले से निकलता चाँद
फलक से
इस ढलती शाम पर
गहरा जाएगा
फिर से यादें तेरी
मुझे ले जाएँगी
ख़्वाबों के शहर में

और एक दिन का इन्तजार
फिर से एक उम्र में
ढल जाएगा !!
- ranju bhatia

वृंदा की अद्भुत छवि

सुलोचना वर्मा
एक दिन मेरी कविता उकेर रही थी वृंदा की अद्भुत छवि जिसमें रंग उभर रहे थे तरह-तरह के उसके अभिशाप और उसकी पवित्रता से जुड़े प्रत्येक रंग का था अपना-अपना प्रश्न जिनका उत्तर देने हेतु प्रकट होते हैं श्री कृष्ण और उनके तन पर होती है- गुलाबी रंग की धोती विदित है उन्हें- नहीं भाता है मुझको पीला रंग यहाँ उनका वर्ण भी श्याम नहीं होता है होता है गेहुआं- मेरी पसंद की मानिंद 
फिर होता है कुछ ऐसा कि भनक पड़ जाती है राधा को उनके आने की सरपट दौड़ आती है लिए अपने खुले काले केश जिसे गूंथने लगते हैं बड़े ही जतन से राधारमण राधा छेड़ देती है तान राग कम्बोज की धरकर माधव की बांसुरी अपने अधरों पर
झूमने लगता है मेरे मन का श्वेत मयूर मैं लीन हो जाती हूँ वंशी की उस धुन पर कि तभी शोर मचाता है धर्म का एक ठेकेदार लगाया जाता है आरोप मुझपर- तथ्यों से छेड़खानी का पूछे जाते हैं कई प्रश्न धर्म के कटघरे में माँगे जाते हैं कई प्रमाण मुझसे गुलाबी धोती से लेकर, राधा के वंशीवादन तक कृष्ण के वर्ण से लेकर, मन के श्वेत मयूर तक
मैं लेकर दीर्घ-निश्वास, रह जाती हूँ मौन  और मेरे मौन पर मुखड़ हो उठती है मेरी कविता  पूछत…

मुट्ठी भर जिंदगी

रोज़ तलाश शुरू होती है     मुट्ठी भर जिंदगी की.......     ढूंढती उसे हर शय में     बालकनी की धूप में     बच्चों की मुस्कान में     किसी अपने की बातों में     कुकर की सीटी में     किसी टीवी सीरियल में     मार्केट में दुकान पर     टंगे किसी आकर्षक परिधान में     चटपटे गोलगप्पों में     पर थोड़ी-थोड़ी जोड़ कर भी     उतनी नही है हो पाती     कि एक दिन का     जीना निकल पाए !     जितनी जोड़ पाती हूँ     उसमे में भी रिस-रिस कर     बहुत अल्प रह जाती है     और मैं रह जाती हूँ     रोज़ ही घाटे में !!                    - रचना आभा

“शब्दों, भावनाओं और प्रकृति का अनूठा कोलाज—“उन्मेष”

पुस्तक : “उन्मेष” कवियत्री:मानोशी प्रकाशक: अंजुमन प्रकाशन इलाहाबाद। मूल्य: रू0200/- मात्र। प्रथम संस्करण:2013
          आज की हिन्दी कविता सामाजिक सरोकारों से ज्यादा जुड़ी है।इसमें व्यवस्था का विरोध है।आम आदमी की चिन्ताएं हैं।देश,समाज,प्रकृति,पर्यावरण,राजनीति जैसे सरोकारों को लेकर वैश्विक स्तर की सोच है।और इन्हीं सरोकारों,संदर्भों और चिन्ताओं के अनुरूप ही आज की हिन्दी कविता का शिल्प,भाषा और बुनावट भी है।नई कविता की शुरुआत के साथ ही उसके शिल्प,रचनात्मकता,भाषा और बुनावट में भी तरह-तरह के प्रयोग और बदलाव होते रहे हैं। इन प्रयोगों और बदलावों का हिन्दी काव्य पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनो तरह का प्रभाव पड़ा। सकारात्मक यह कि कविता के पाठको को नये बिम्ब,नये गठन और शिल्प की प्रयोगधर्मी रचनाए पढ़ने को लगातार मिल रही हैं। नकारात्मक यह कि काव्य से गेय तत्व क्रमशः कम होने लगा। छंदात्मक रचनाए कम लिखी जाने लगी।सपाट बयानी का पैटर्न धीरे-धीरे हिन्दी काव्य पर हावी होने लगा। लोगो में कविता पढ़ने के प्रति रुझान कम होने लगी।           आज हिन्दी कविता का जो परिदृश्य है उसमे उन्मेष”जैसे काव्य संकलन को पढ़ना अपने आप म…

हमारे रचनाकार : जगदीश पंकज

पूरानाम : जगदीश प्रसाद जैन्ड जन्म: 10 दिसम्बर 1952 स्थान: पिलखुवा, जिला-गाज़ियाबाद (उ.प्र .) शिक्षा: बी .एस सी . विभिन्नपत्र – पत्रिकाओं में गीत एवं कवितायें प्रकाशित, एक नवगीत संग्रह प्रकाशनाधीन सम्प्रति: सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में वरिष्ठ प्रबन्धक के पद से सेवा निवृत्त एवं स्वतंत्रलेखन संपर्क : सोमसदन ,5/41 सेक्टर -2 ,राजेन्द्रनगर,