Skip to main content

Posts

Showing posts from July, 2014

लघुकथा- थप्पड़

अपने बच्चों को सिंकते हुए भुट्टे और बिकते हुएजामुनोंको ललचाई नज़रों से देखते हुए वह मन मसोस कर रह जाती थी। आज उसे तनख़्वाह मिली थी, उसके हाथों में पोटली देख कोने में खेलते हुए दोनों बच्चे खिलौने छोड़ दौड़ पड़े। तभी बीड़ी पीते हुए पति ने उससे कहा- “लापैसे, बहुत दिनों से गला तर नहीं हुआ”... “लेकिन आज मैं बच्चों के लिए...” तड़ाक!..."तो तू मेरे खर्च में कटौती करेगी?”        पोटली जमीन पर गिरी, जामुनऔर भुट्टे मैली ज़मीन सूँघने लगे और... माँ पर पड़े थप्पड़ से सहमे हुए बच्चे अपना गाल सहलाते हुए पुनः अपने टूटे-फूटे खिलौनों के साथ कोने में दुबक गए। - कल्पना रामानी

महिमा श्री की कविताएँ

महिमा श्री का परिचय:- पिता:- डॉ शत्रुघ्न प्रसाद माता:- श्रीमती उर्मिला प्रसाद जन्मतिथि:- १८ अक्टूबर ईमेल:- mahima.rani@gmail.com साहित्यिक गतिविधियाँ:- साझा काव्यसंकलन “त्रिसुगंधी” एवं “परों को खोलते हुए-१“ में रचनाएँ,

त्रासदी ....

कुछ कर गुजरने की तमन्ना कितनी सुखद होती है कल्पनाशीलता जिंदगी की सुखद डोर है जिसे नापते-नापते आदमी फ़ना हो जाता है मगर उसका छोर नहीं मिलता 
कल्पना के पर लग जाना  मनुष्य की सुखद स्मृतियों का पहला अध्याय है जिसके सहारे लाँघता जाता है हर बाधा कि शायद अब मंजिल नजदीक है मगर वह नहीं जानता  मृगमरीचिका की इस स्थिति में उसे सिर्फ रेत ही मिलेगी   शायद! आदमी की यही त्रासदी है
नदी सी मैं ....
जिंदगी के चंद टुकड़े
यूँ ही बिखरने दिया
कभी यूँ ही उड़ने दिया
रखना चाहा जब कभी संभालकर
समय ने न रहने दिया

नदी सी मैं बहती रही
कभीमचलती रही
कभी उफनती रही
तोड़कर किनारे जब भी चाहा बहना बाँधों से जकड़ा पाया
गंदे नाले हों
या शीतल धारा
जो भी मिला
अपनाबना डाला
जिंदगी
कभी नदी सी
कभी टुकड़ों-सी
जैसे भी पाया
बस जी डाला
इन्तजार कीअवधि

मृत्यु जब तक तुम्हारा वरण नहीं कर लेती
तब तक करो इन्तजार

रखो अटलविश्वास गले लगा लो सारीप…