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Showing posts from June, 2014

उदय प्रकाश की दो कविताएँ

उदय प्रकाश

(१)
पिंजड़ा 

चिड़िया
पिंजड़े में नहीं है.

पिंजड़ा गुस्से में है
आकाश ख़ुश.

आकाश की ख़ुशी में
नन्हीं-सी चिड़िया
उड़ना
सीखती है.
-  -  -  -  -

(२)
दिल्ली

समुद्र के किनारे
अकेले नारियल के पेड़ की तरह है
एक अकेला आदमी इस शहर में.

समुद्र के ऊपर उड़ती
एक अकेली चिड़िया का कंठ है
एक अकेले आदमी की आवाज़

कितनी बड़ी-बड़ी इमारतें हैं दिल्ली में
असंख्य जगमग जहाज
डगमगाते हैं चारों ओर रात भर
कहाँ जा रहे होंगे इनमें बैठे तिज़ारती
कितने जवाहरात लदे होंगे इन जहाजों में
कितने ग़ुलाम
अपनी पिघलती चरबी की ऊष्मा में
पतवारों पर थक कर सो गए होगे.

ओनासिस ! ओनासिस !
यहाँ तुम्हारी नगरी में
फिर से है एक अकेला आदमी

ज्योतिर्मयी पन्त की कहानी

ज्योतिर्मयी पंत
                   लक्ष्मी कृपा
कविता बुआ अपने मायके आईहुई थीं.उनके बड़े बेटेऔर बहू दो बेटियों के माता-पिता बन चुके थे और अब बड़ी बहू बीमारी के कारण माँ नहींबन सकती थी.अतः बुआ बहुत उदास थीं. पर जब छोटी बहू भी एक पुत्री को जन्म दे चुकी तोउनके सब्र का बाँध टूट गया.दुबारा जब बहू उम्मीद से हुई तो बुआ ने अपनी डॉक्टरभतीजी से बच्चे की लिंग जाँच कराने में मदद चाही. इस बात पर सबने उन्हें इतना भला-बुराकहा किनाराज़ होकर उनहोंने सबसे रिश्ते ही तोड़डाले.अब वे टोना-टोटका तथा अन्य दवाओं का प्रयोग करवाना चाहती थी इसलिएअपने गाँव आई थीं किज्योतिषियों और तांत्रिकों की मददली जा सके.एक शाम को गाँव के टीले में रहनेवाले बाबा जी से मशविरा करने पहुँच गई.मनमाने रूपये ऐंठकर बाबा ने कुछ दवाएँ दे दीऔर कह दिया की गर्भ में अगर लड़की हुई तो अपने आप छुटकारा मिल जाएगा. अगले दिन एकज्योतिषी के पास जाकर उसे बेटे-बहू और परिवार के सभी जनों की पत्रियाँ दे आईं. पंडित जी ने कहा कि अतिव्यस्तता के कारण वे एक हफ्ते में सारी बातें बतापायेँगे. बुआ को अब घर लौटने की जल्दी थी ताकि तांत्रिककी दी दवा का प्रयोग कर सकें. बहू को…