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Showing posts from May, 2014

तुम अमर, मैं नश्वर

- डा० (श्रीमती) तारा सिंह
प्रिये ! विजननीरमें, चौंकअचानक जबभीमैंनींदसे, उठबैठताजाग देखता,तुमगहनकाननकेतरुतममें अपनेदोनयनोंकाविरहदीपजलाये व्यग्र, व्याकुलघूमरहीहोचुपचाप
इंगितकरतरुओंकापात पूछरहीहो, डालीसे, हे ! मृगमदके