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Showing posts from May, 2013

बच्चन जी की दो कविताएं

आज परम् वन्दनीय हरिवंश राय बच्चन जी की कविताएं पढ़ रही थी,चाहे जितनी बार पढ़ीं जाएं पर नवीनता कम होती ही नहीं। यही तो विलक्षणता है उस महान साहित्य के पुरोधा में! आपसे से भी साझा करते हैं उनकी दो रचनाएं- राजभाषा हिंदी: यह पपीहे की रटन हैराजभाषा हिंदी: उस पार न जाने क्या होगा!…. हरिवंश राय बच्चनसादर

विधाओं की बहार...

सादर अभिनन्द सुधी वृन्द! 
 आज की प्रस्तुति में आपका स्वागत् है। कहते हैं न दोस्तों, कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। तो आज के साहित्य में समाज की जिज्ञासा, उत्साह और हुनर स्पष्ट प्रतिबिम्बित होती है। लेकिन दूसरी तरफ लोकप्रियता की अतिशय चाहत भी प्रतिध्वनित होती है। आज के साहित्य पर प्रकाश डाला जाए तो विधाओं की एक बहार सी है। हमारे वरिष्ठ विद्वत जन, जो साहित्य के पुरोधा हैं, अपनी लेखनी से अनेक विधाओं को तराश ही रहे हैं, युवा/नवीन साहित्यकारों की भी लेखनी अजमाइश में पीछे नहीं है और सफल भी हो रहे हैं। विधाओं में चाहे गज़ल, गीत, नवगीत हो या कुछ पाश्चात्य विधाएं, आतुकान्त कविता हो या अनेक भारतीय छन्द...अपने यौवन पर हैं, देखें इन सूत्रों के साथ- 

सॉनेट/आस सी भरती

सॉनेट/ तुम आ जाओ: 14 पंक्तियां, 24 मात्रायें तीन बंद (Stanza) पहले व दूसरे बंद में 4 पंक्तियां पहली और चौ थी पंक्ति तुकान्त दूसरी व तीसरी पंक्ति 

दास्ताँने - दिल (ये दुनिया है दिलवालों की): 

ग़ज़ल : कदम डगमगाए जुबां लडखडाये: ओबीओ लाईव महा-उत्सव के 31 वें में सम्मिलित ग़ज़ल:- विषय : "मद्यपान निषेध" बह्र : मुतकारिब मु…

ये कौन आता है तन्हाइयों में जाम लिए

           - मख़दूम मोहिउद्दीन ‎ येकौनआताहैतन्हाइयोंमेंजामलिए
जिलों[1]मेंचाँदनीरातोंकाएहतमामलिए

चटकरहीहैकिसीयादकीकलीदिलमें
नज़रमेंरक़्स-एबहाराँकीसुबहोशामलिए

हुजूमेबादा-ओ-गुल[2]मेंहुजूमेयाराँमें
किसीनिगाहनेझुककरमेरेसलामलिए

किसीक़्यालकीख़ुशबूकिसीबदनकीमहक
दर-ए-कफ़सपेखड़ीहैसबापयामलिए

महक-महक<

महानगर में यौवन आया

जयहिन्द स्नेही सुधीवृन्द... आज के अंक में आपका हृदयातल से स्वागत है। शुरुआत एक खुशखबर के साथ,वह यह कि आज याने 18/05/2013 से अपने शहर लखनऊ में ओ.बी.ओ.(open book online) की तरफ से एक साहित्यिक चैप्टर की शुरुआत होने जा रही है,जिसमें प्रबन्धन सहयोग आदरणीय श्री बृजेश सर का भी रहेगा। उद्धाटन स्वरूप एक साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। समय होने पर आदरणीय सर से सम्पर्क कर जरूर पधारें,महानगर में यौवन आया है-
नवगीतकीओर: महानगरमेंयौवनआया

गजोधर भाई, आप तो शराब नहीं पीते थे!/ जवाहर - Open Books Online

रूप-अरूप: मन की उलझन.......: अचानक थम जाए, चलती हवा और सांझ डूबने को हो तो लगता है  कि‍सी के बेवक्‍त चले जाने का मातम मना रही हो वादि‍यां.... * * * * *  फि‍र आया था ...

उच्चारण: "गांधी हम शरमिन्दा हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री '...: असत्य की जीत  सत्य की हार  मची हुई है  चीख-पुकार  सूरज उगल रहा है  अन्धकार  चारों ओर है मारा-मार  सूरज है ठण्डा  चाँ...

ग़ज़ल - शिवाजी भी यहीं के हैं, नहीं क्यों याद आता है - Open Books Online

hum sab kabeer hain: ताज़ा गोश्त: पूरे पंद्रह सौ... सर ! ही.. ह…

साँझा चूल्हा

सभी मित्रों को नमस्कार!
साहित्य की निर्झर धारा निरंतर प्रवाहमान है। इसी धारा में से कुछ लहरें आपके सम्मुख लिंक्स के रूप में प्रस्तुत हैं -

अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ): साँझा चूल्हा खो गया...: कुण्डलिया छंद साँझा चूल्हा खो गया , रहा न अब वो स्वाद शहर लीलते खेत नित , बंजर करती खाद बंजर   करती   खाद , गुमे  मिट्टी के  ...

http://sadalikhna.blogspot.in/2013/04/blog-post_26.html

उच्चारण: "दर्द दिल में जगा दिया उसने" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

उम्मीद तो हरी है .........: प्यार के खुरदुरेपन ने-------: वर्षों से सम्हाले  प्यार के खुरदुरेपन ने

भावाभिव्यक्ति: अंधेरा

.डॉ. आशुतोष वाजपेयी का काव्य संग्रह : स्वाभिमान जा रहा: एक क्लीव को बना दिया है देश का प्रधान देख निर्विरोध बढ़ा शत्रु चला आ रहा या कि पहुँचा दिया गया है ढेर अर्थ उसे चीन का बना दलाल शत्रु को ...

सिंहनाद: ग़ज़ल - शिवाजी भी यहीं के हैं, नहीं क्यों याद आता ...: कोई पगड़ी कुचलता तो कोई आँखें दिखाता है।  सहन करने लगे हम तो हमें जग आजमाता है। सभी कहते अरे भाई, हमारा देश गाँधी का, शिवाजी भी यहीं के...

नीरज: प…

मुश्किल राहें...

शुभप्रभात् सुहृद मित्रों!
     सप्ताहान्त के संग्रह में आप सभी का हृदयातल से स्वागत है। इस बार 'मजदूर दिवस' नें साहित्य को खासी गति दी, लेकिन मजदूरों के अधिकार को कितनी गति मिली ये तो एक मजदूर ही बता सकता है, पर बेचारे को अपने अधिकारों की जानकारी हो तब न! एक दृश्य यहां साझा करने को मैं बाध्य हो रही हूं- विद्यालय में छात्रों के अभिभावकों के खाता सं. की आवश्यकता हुई सो मैनें खोता सं. लाने को कहा। तभी एक व्यक्ति आया, लाचार आँखे, कांपती आवाज पर चेहरे पर मुस्कान...बोला- ''हमारे पास कोई बैंक की किताब तउ हइ नाइ, मनरेगा वाली रहइ जो प्रधान देतइ नाइं।'' मैंने कहा आप वही ले आइए और उसे अपने पास रखिये ये आपका अधिकार है. बात काटते वो श्रीमान बोले-''अरे दीदी आप तउ यहे बतइहउ, कुछ रोपया परधान कबहूं कबहूं दइ देत हैं, उन्हहू से हाथ धोइ बैठी।'' अब बताइए वो अपने दूसरे अधिकारों को कितना समझते होंगे। आप खुद ही अंदाजा लगा लीजिए।
     पिछले दिनों सरबजीत जी की मृत्यु नें झकझोर कर रख दिया। लेकिन भारत की बेटियों का जज्बा कहते बनता है, जब उनसे पूंछा गया कि क्या चाहती हैं, तब…