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Showing posts from April, 2013

एक झलक

राम राम सुधी वृन्द!
आज शनिवार से पहले ही...
     दरअसल पिछले कई महीनों से लगातार आदरणीय श्री बृजेश जी की कविताएं/लेख/संकलन आदि कई जगह, जैसे उजेषा टाइम्स, बारिस-ए-अवध, पूर्वाभास आदि में पढ रही हूं। कई साहित्यिक प्रतियोगिताओं में भी आपने बाजी मारी। फिर इस ब्लाग और 'निर्झर टाइम्स' समाचार पत्र के साहित्य अंक के आप मुख्य एडमिन् हैं, यहां एक संकलन तो आपकी रचनाओं/परिचय का होना ही चाहिए ।
    'निर्झर टाइम्स' बिधूना से प्रकाशित एक समाचार पत्र है, जिसका पेज नं-5 साहित्य को समर्पित है। हुआ यूं दोस्तों कि आदरणीय बृजेश जी के समर्पण को देखते हुए 'निर्झर टाइम्स' के संपादक आदरणीय श्री एस.पी.सिंह सेंगर जी ने ब्लाग का दायित्व आपको ही सौंप दिया। फिर कुछ दिन पहले मैं भी इस ब्लाग से जुड़ी।
     एक प्रस्तुति आपको समर्पित- परिचय देने की आवश्यकता नहीं क्योंकि 'पूर्वाभास' के लिंक मे सब कुछ है ही, इसके अलावा इतना जरूर कहूंगी कि आपकी लेखनी हर विधा में चली, चाहे ग़जल हो या नवगीत, हाइकू हों या भारती छंद, अतुकांत कविता या गद्य लेखन/लधुकथा। गजल पर तो छोटा-मोटा शोध आपने तैयार किया है। अ…

ग़ज़ल

- क़तील शेफाई
तूने ये फूल जो ज़ुल्फ़ों में लगा रखा है इक दिया है जो अँधेरों में जला रखा है
जीत ले जाये कोई मुझको नसीबों वाला ज़िन्दगी ने मुझे दाँव पे लगा रखा है
जाने कब आये कोई दिल में झाँकने वाला इस लिये मैंने ग़िरेबाँ को खुला रखा है
इम्तेहाँ और मेरी ज़ब्त का तुम क्या लोगे मैं ने धड़कन को भी सीने में छुपा रखा है
दिल था एक शोला मगर बीत गये दिन वो क़तील अब क़ुरेदो ना इसे राख़ में क्या रखा है

सफ़र...

सादर प्रणाम सुधी मित्रों...
कुछ तकनीकी दिक्कतों के कारण विलम्ब से उपस्थित हो पा रहीं हूं, क्षमा करें।
     आज के दौड़ते दौर में वेद-पुराण की उक्तियां शायद पृष्ठभूमि में चली गई हैं,फिर भी आज के अंक की शुरुआत एक वेदोक्ति से करना चाहूंगी-
''अदित्यै रास्नासीन्द्राण्याऽ उष्णीष:।  पूषासि धर्माय दीष्व।।       अर्थात्, हे स्त्री! तू सृष्टि का प्रमुख आधार है। तू गृहस्थ का गौरव है। पृथ्वी के समान पालन करने वाली माता है। तू संसार कार्यों को पूर्ण मनोयोग से सम्पन्न कर।
     ये तो रही दोस्तों वेदों की बात,अब आज के दौर का सफर करते हैं,आपकी ही ज़बानी के साथ- ...

लम्हों का सफ़र: 401. अब तो जो बचा है...

Voice of Silent Majority: घनाक्षरी: ओपन बुक्स ऑनलाइन, चित्र से काव्य तक छंदोत्सव, अंक-२५ में मेरी रचना (चित्र ओबीओ से साभार) चौड़ी नही छाती मेरी, हौसला तो...

नजरिया: सुनिये गाय का दर्द - गाय के ही श्रीमुख से...

"हैवानियत का आलम' | भूली-बिसरी यादें

रंग-बिरंगी कुण्डलियाँ: कुण्डलिया - भारत की हम बेटियाँ, सीमापर तैनात: भारत की हम बेटियाँ, सीमापर तैनात। निर्भय हो मेरे वतन, खाएंगे रिपु…

ज़िन्दगीनामा

नमस्कार मित्रों.... आज के अंक में आपका हृदयातल से स्वागत है। कहते हैं न! जिंदगी में अनेक रंग होते हैं,सही ढंग से संयोजित हों तो एक खुशहाल बगिया...और कुछ असंयोजित हों पतझर...। ये तो कर्म और किस्मत की करामात है लेकिन वास्तव में जिंदगी तो सभी की अनेक रंगों से ही सजी होती है,अब वो रंग प्यार,सफलता, मान,अपमान,हास,उपहास... कोई भी हो सकता है। ये तो रही बात जिंदगी की दोस्तों,ऐसे ही कुछ रंगो,जो आपकी ही कला का परिणाम है, को चुनकर व संयोजित कर आपको ही समर्पित करने का प्रयास किया है। अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया से इसे आप खूबसूरत बना सकते है-

ज़िन्दगीनामा: डर: स्याह सी खामोशियों के इस मीलों लंबे सफ़र में तन्हाइयों के अलावा .. साथ देने को दूर-दूर तक कोई भी नज़र नहीं आता . जी में आता है कि क...

उच्चारण: "ओ बन्दर मामा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'): कहाँ चले ओ बन्दर मामा , मामी जी को साथ लिए। इतने सुन्दर वस्त्र आपको , किसने हैं उपहार किये।। हमको ये आभास हो रहा , शा...

बाँटने थे हमेंसुख-दुःखअंतर्मन की को...: अज्ञानता बाँटने थे हमें सुख - दुःख अंतर्मन की कोमल भावनाएं शुभकामनाएं और…

नवरात्रि के पर्व पर मंगलकामना

विशेष निवेदन:- कुछ तकनीकी समस्याओं के कारण वंदना जी की मेहनत पर पानी फिर गया। कम्प्यूटर की समस्या के चलते उनके द्वारा चयनित लिंक्स और पोस्ट डिलीट हो गयीं। उनकी श्रम को आदर देते हुए उनके ही शब्दों में आज की चर्चा एक नए रूप में आपके समक्ष प्रस्तुत है। आशा है आप गलतियों को क्षमा करेंगे। -----------------------------------------------------------------------------------------------------------
वासंतिक नवरात्रि के पर्व पर मंगलकामना के साथ करबद्ध शुभप्रभात! आदरणीय सुधी वृन्द New year के जोश को हम कई दिन पहले से कई दिन बाद तक बरकार रखते हैं तो 'नववर्ष' का जोश प्रतिपदा के बाद से फीका क्यों पड़ने लगा! लेकिन सौभाग्य की बात है कि इस बार विगत वर्षों की अपेक्षा जनमानस में ज्यादा उत्साह गोचर हुआ। यह नव संवत् 2067 की प्रथम मुलाकात है,इसलिए आप सभी को नववर्ष की हृदयातल से असीम शुभकामनाएं। अपनें जोश को कायम रखते हुए भारतीयता के धूमिल होते सूरज को पुन: दैदीप्यमान करने का सतत् प्रयास करें। इसी कड़ी मे आज की शुरुआत एक नन्हें कलाकार के अनोखे उपहार के साथ- - -

Sankalp's Pencil Strokes: Rose: नव…

ये कौन आता है तन्हाइयों में जाम लिए

कुछ तकनीकी समस्याओं के चलते आज की शनिवारीय चर्चा आपके समक्ष प्रस्तुत नहीं की जा सकी। समस्या शायद मेरे कम्प्यूटर में है। इसके लिए क्षमा प्रार्थी हूं। इस दिक्कत में बस यही आवाज निकल रही है.

ये कौन आता है तन्हाइयों में जाम लिए /  -मख़दूम मोहिउद्दीन
येकौनआताहैतन्हाइयोंमेंजामलिए जिलों[1]मेंचाँदनीरातोंकाएहतमामलिए
चटकरहीहैकिसीयादकीकलीदिलमें नज़रमेंरक़्स-एबहाराँकीसुबहोशामलिए
हुजूमेबादा-ओ-गुल[2]मेंहुजूमेयाराँमें किसीनिगाहनेझुककरमेरेसलामलिए
किसीक़्यालकीख़ुशबूकिसीबदनकीमहक दर-ए-कफ़सपेखड़ीहैसबापयामलिए

आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक

- मिर्ज़ा गालिब आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक।
आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक।
हम ने माना कि तग़ाफुल न करोगे लेकिन ख़ाक हो जाएँगे हम तुमको ख़बर होने तक।
ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़ मर्ग इलाज शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक।

सब्र-तलब = Desiring/Needing Patience
तग़ाफुल = Ignore/Neglect
जुज़ = Except/Other than
मर्ग = Death
शमा = Lamp/Candle
सहर = Dawn/Morning

Wings of Fancy

आज से निर्झर टाइम्स की इस चर्चा की जिम्मेदारी आदरणीया वन्दना तिवारी जी द्वारा सहर्ष स्वीकार की गयी थी लेकिन कुछ तकनीकी समस्याओं के कारण वो चर्चा को आज मूर्त रूप नहीं दे पायीं इसलिए उनके सहायक के रूप में मैं आज यहां उपस्थित हूं। वन्दना जी द्वारा यह निर्धारित किया गया है कि वे हर शनिवार को संकलन के रूप में चर्चा लेकर यहां उपस्थित होंगी। मैं अब से बीच बीच में साहित्य के पुरोधाओं की रचनायें लेकर आपके समक्ष उपस्थित होता रहूंगा। तो पेश है वन्दना जी द्वारा संकलित आज की चर्चा-

Wings of Fancy: 'भावों का आकार': उर के आंगन मे बिखरी है भावों की कच्ची मिट्टी मेधा की चलनी तो है,हिगराने को कंकरीली मिट्टी रे मन! बन जा कुम्भज संयम नैतिकता के कुशल हस्त ...

hum sab kabeer hain: ज़िंदगी का सफ़र

उच्चारण: "ग़ज़ल-सलीके को बताता है..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

स्वस्थ जीवन: Healthy life: साँस की बदबु:हँसी के कारण: "भले ही इंसान का व्यक्तित्व कितना ही अच्छा क्यों न हो मगर   उसकी एक कमी उसे लोगों के बीच हंसी का पात्र बना सकती है।" आज ...

Amrita Tanmay: सुनवाई चल रही है ...: अर्थ ह…

मेरी संवेदना

आप सभी का मूर्ख दिवस पर हार्दिक स्वागत। होली के तुरन्त बाद ‘मूर्ख दिवस’ कुछ अलग ही रंग लेकर आया है। इस रंगे बिरंगे माहौल में साहित्य के कुछ रंग आपके समक्ष प्रस्तुत हैं-

1- मेरी संवेदना: होली और तुम्हारी याद

2- hum sab kabeer hain: प्रेम

3- मेरी धरोहर: मैं शरणार्थी हूं तेरे वतन में..........सुमन वर्मा: कितना दर्द है मेरे जिगर में गली-गली मैं जाऊं आग से ...

4- Kashish - My Poetry: ‘उजले चाँद की बेचैनी’- भावों की सरिता:     अपनी  शुभ्र चांदनी से प्रेमियों के मन को आह्लादित करता, चमकते तारों से घिरा उजला चाँद भी अपने अंतस में कितना दर्द छुपाये रहता ...

5- मेरी धरोहर: अब क़ुरेदो ना इसे राख़ में क्या रखा है .......काति...:   तूने ये फूल जो ज़ुल्फ़ों में लगा रखा है इक दिया है जो अँधेरों में जला रखा है  जीत ले जाये कोई मुझको नसीबों वाला ज़िन्दगी ने मुझे द...

6- ज़रूरत: विक्रम वेताल १०/ नमकहराम: आज होली पर राजा विक्रम जैसे ही दातुन मुखारी के लिए निकला वेताल खुद लटिया के जुठही तालाब के पीपल पेड़ से उतर कंधे पर लद गया दोनों न...

7- जोश में होश खोना | भूली-बिसरी यादें

8- मेरा रचना संसार: मैं तेरा कितना ह…