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Showing posts from November, 2012

ऐ इन्सानो!

- गजाननमाधवमुक्तिबोध
आँधीकेझूलेपरझूलो ! आगबबूलाबनकरफूलो ! कुरबानीकरनेकोझूमो ! लालसवेरेकामूँहचूमो ! ऐइन्सानोओसनचाटो ! अपनेहाथोंपर्वतकाटो ! पथकीनदियाँखींचनिकालो ! जीवनपीकरप्यासबुझालो ! रोटीतुमकोरामनदेगा ! वेदतुम्हाराकामनदेगा ! जोरोटीका

फ़िराक़ गोरखपुरी की पांच ग़ज़लें

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अबअक्सरचुप-चुपसेरहेहैंयूँहीकभूलबखोलेहैं
पहले "फ़िराक़" कोदेखाहोताअबतोबहुतकमबोलेहैं

दिनमेंहमकोदेखनेवालोअपनेअपनेहैंऔक़ात जाओनतुमइनख़ुस्कआँखोंपरहमरातोंकोरोलेहैं
फ़ितरतमेरीइश्क़-ओ-मुहब्बतक़िस्मतमेरीतन्हाई कहनेकीनौबतहीनआईहमभी